रामलीला के चौथे दिन परशुराम संवाद एवं राम विवाह का मंचन किया गया

ग्राम पंचायत छुरी में दुर्गा उत्सव सेवा समिति के तत्वाधान में चल रही रामलीला के चौथे दिन परसू राम संवाद एवं राम विवाह का मंचन किया गया ग्रामीणों द्वारा बताया गया कि यह उस समय का दृश्य है जब मिथिला के राजा जनक ने अपनी पुत्री सीता के विवाह हेतु स्वयंवर आयोजित किया था और देश विदेश से सभी शक्तिशाली राजाओं को न्योता भेज उन्हें अपने राज्य में उपस्थित होने का निमंत्रण दिया था।
इस स्वयंवर के लिए एक चुनौती रखी गयी थी कि जो भी राजा भगवान शिव के दिव्य धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाएगा, उसी से राजकुमारी सीता का विवाह होगा।

इस स्वयंवर में मुनि विश्वामित्र भी अयोध्या के दो सुंदर राजकुमारों श्री राम और लक्ष्मण के साथ पधारे। अंत में जब कोई राजा धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाना तो दूर कोई उसे हिला भी न सका तब राम ने धनुष उठाया और उनके धनुष उठाते ही उसका खंडन हो गया। उस शिव धनुष के टूटने की गर्जना इतनी तेज थी कि तीनों लोको में हाहाकार मच गया। सीता ने राम को वरमाला पहनाई और उन्हें अपने पति के रूप में स्वीकार किया।

भगवान परशुराम शिव जी के अनन्य सेवक थे, वे सदैव शिव की भक्ति में लीन रहते थे। जब उन्हें पता चला कि उनके आराध्य भगवान शिव का धनुष किसी ने तोड़ दिया है तो परशुराम अति क्रोधित हुए। वे तुरंत मिथिला नगरी पहुंच गये,
वहां पर परशुराम और लक्ष्मण के बीच कुछ तीखे संवाद हुए, पंचायत राम विवाह का आयोजन संपन्न किया गयाराजा दशरथ के घर पैदा हुए थे और सीता राजा जनक की पुत्री थी। मान्यता है कि सीता का जन्म धरती से हुआ था। राजा जनक हल चला रहे थे उस समय उन्हें एक नन्ही सी बच्ची मिली थी जिसका नाम उन्होंने सीता रखा था। सीता जी को “जनकनंदिनी” के नाम से भी पुकारा जाता है।

एक बार सीता ने शिव जी का धनुष उठा लिया था जिसे परशुराम के अतिरिक्त और कोई नहीं उठा पाता था। राजा जनक ने यह निर्णय लिया कि जो भी शिव का धनुष उठा पाएगा सीता का विवाह उसी से होगा।

सीता के स्वयंवर के लिए घोषणाएं कर दी गई। स्वयंवर में भगवान राम और लक्ष्मण ने भी प्रतिभाग किया। वहां पर कई और राजकुमार भी आए हुए थे पर कोई भी शिव जी के धनुष को नहीं उठा सका।

राजा जनक हताश हो गए और उन्होंने कहा कि “क्या कोई भी मेरी पुत्री के योग्य नहीं है?” तब महर्षि वशिष्ठ ने भगवान राम को शिव जी के धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाने को कहा। गुरु की आज्ञा का पालन करते हुए भगवान राम शिव जी के धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाने लगे और धनुष टूट गया।

इस प्रकार सीता जी का विवाह राम से हुआ। भारतीय समाज में राम और सीता को आदर्श दंपत्ति (पति पत्नी) का उदाहरण समझा जाता है। राम सीता का जीवन प्रेम, आदर्श, समर्पण और मूल्यों को प्रदर्शित करता है।

विवाह पंचमी के दिन नहीं होता है विवाह

विवाह पंचमी के दिन राम और सीता का विवाह हुआ था, पर इसके बावजूद भारत के कई स्थानों में इस दिन विवाह नहीं किए जाते हैं। नेपाल और मिथिलांचल में भी इस दिन विवाह नहीं किया जाता है। कुछ लोग राम और सीता के विवाह को एक दुखद विवाह मानते हैं।

राम और सीता को विवाह के बाद बहुत से कष्टों को उठाना पड़ा था। राम को राजा दशरथ ने 14 वर्षों का वनवास दे दिया था। जब सीता गर्भवती हुई तो राम ने उनका त्याग कर दिया।

परशुराम जी के क्रोध को देखकर राम, परशुराम से कहते है कि हे नाथ! शिवजी के धनुष को तोड़ने वाला आपका ही कोई दास ही होगा। आप क्रोधित ना हो मुझे आज्ञा दे, मुझसे कहे यह सुनकर परशुराम और ज्यादा नाराज हो जाते है