स्व. नेहा अभिषेक श्रीवास्तव की स्मृति में 27 सितंबर को होगा गरिमामय समारोह
बैतूल। जम्मू-कश्मीर की पूर्व सीनियर जेलर रजनी सहगल को उनके सख्त अनुशासन, निडरता और अपराधियों पर कड़े नियंत्रण के कारण जेल के भीतर आतंकवादियों के बीच आतंक (ञ्जद्गह्म्ह्म्शह्म् शद्घ ञ्जद्गह्म्ह्म्शह्म्द्बह्यह्लह्य) माना जाता था। सख्त मिज़ाज नर्म दिल एवं बेहद संवेदनशील बेटी 27 सितंबर को डाटर्स डे के अवसर पर मणिकर्णिका-2026 सम्मान से नवाजी जाएगी। बैतूल के लिए यह बड़ा ही गर्व एवं संवेदना से भरा दिन है जब एक बेटी की याद में कई बेटियों को सम्मानित किया जाता है। प्रतिवर्ष डॉ वसंत श्रीवास्तव एवं श्रीमती नीरजा श्रीवास्तव द्वारा अपनी बेटी स्व. नेहा अभिषेक श्रीवास्तव की स्मृति में डाटर्स डे के अवसर पर मणिकर्णिका सम्मान समारोह बैतूल सांस्कृतिक सेवा समिति के माध्यम से कराया जाता है। आयोजन समिति में शामिल डॉ वसंत श्रीवास्तव, एड. नीरजा श्रीवास्तव, गौरी बालापुरे पदम बैतूल सांस्कृतिक सेवा समिति, धीरज बोथरा संचालक बोथरा शॉपिग सेंटर, विवेक मालवीय कांतिशिवा ग्रुप बैतूल, एचमार्ट धीरज हिराणी, अतुल गोठी होटल आईसीईन, निर्गुण देशमुख-कमलेश गढ़ेकर वीवीएम बैतूल, समाजसेवी मनीष दीक्षित, राजेश-संगीता अवस्थी, अभिमन्यु श्रीवास्तव प्रबंधक एमपी विनियर्स प्राईवेट लिमि, डॉ कृष्णा मौसिक आरके मेमोरियल हॉस्पीटल, यथार्थ राजेश गुगनानी संचालक आरके अनमोल श्री गुरुकृपा ट्रेडिंग, के संयुक्त तत्वावधान में शासन एवं जनप्रतिनधियों के साझा प्रयास से जिले में आयोजित होने वाले मणिकर्णिका सम्मान ने महज 7 वर्ष में पूरे देश में अलग पहचान बनाई है।
*पुलिस की नौकरी ठुकरा कर जेल सेवा को चुना*
रजनी सहगल जम्मू-कश्मीर की पूर्व वरिष्ठ जेल अधीक्षक हैं, जिनकी कहानी आतंकवाद के दौर में जेल प्रशासन को संभालने, अदम्य साहस और इंसानियत की एक मिसाल है। उन्होंने लगभग 30 से 35 वर्षों तक जम्मू-कश्मीर की बेहद संवेदनशील जेलों में अपनी सेवाएं दीं और वह उत्तर भारत की पहली महिलाओं में से एक थीं, जिन्होंने जेल प्रशासनिक सेवा को अपने करियर के रूप में चुना। शुरुआती दिनों में जब जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. फारूक अब्दुल्ला के समय उन्हें पुलिस विभाग में काम करने का अवसर मिल रहा था, तो उन्होंने मना कर दिया और जेल सेवा को चुना। उनका मानना था कि अगर वह नौकरी करेंगी तो जेल विभाग में ही करेंगी। वर्ष 1988 में उन्होंने प्रिजऩ और करेक्शनल सर्विसेस को जॉइन किया। उस दौर में महिलाओं का पुलिस या सुरक्षा बलों में होना केवल कांस्टेबल रैंक तक ही सीमित माना जाता था, ऐसे में एक महिला अधिकारी के तौर पर जेल संभालना एक क्रांतिकारी कदम था।
*जेल की सुरक्षा को मुस्तैदी से संभाल सकती है महिला भी*
रजनी सहगल की ड्यूटी का एक बड़ा हिस्सा जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद के चरम दौर के बीच बीता। उन्होंने पुंछ, कोट भलवाल और जम्मू की बेहद संवेदनशील जेलों में काम किया। उनके कार्यकाल के दौरान जेलों में कई खूंखार आतंकवादी, हाई-प्रोफाइल कैदी और देशविरोधी तत्व बंद थे। उनकी जेलों में
लश्कर-ए-तैबा, जैश-ए-मोहम्मद, हरकत-उल-अंसार, अल-बदर मुजाहिदीन और हरकत-ए-जिहाद-ए-इस्लामी जैसे कई पाकिस्तानी और स्थानीय आतंकवादी व हाई-प्रोफाइल कैदियों को कस्टडी में रखा गया। बम ब्लास्ट, आतंकी हमलों के खतरे और भारी मानसिक तनाव के बीच उन्होंने जेलों के भीतर सख्त अनुशासन बनाए रखा। खूंखार अपराधियों के प्रति सख्त रहने के साथ-साथ उन्होंने कैदियों के सुधार पर भी काम किया। जेलों में नशे के आदी कैदियों की स्थिति और कैदियों की काउंसिलिंग को लेकर उन्होंने हमेशा मानवीय दृष्टिकोण अपनाया। अपनी कार्यकुशलता और कड़े रुख से उन्होंने साबित किया कि एक महिला भी जेल की सुरक्षा को मुस्तैदी से संभाल सकती है। एक बेटी, पत्नी और माँ के रूप
में पारिवारिक जिम्मेदारियों को निभाते हुए, इतनी चुनौतीपूर्ण और खतरनाक ड्यूटी को सफलतापूर्वक संभालना उनके लिए एक लंबा और कड़ा संघर्ष था। उन्होंने हर स्तर पर आने वाली रूढिय़ों और मुश्किलों को पार कर समाज में अपनी एक अलग पहचान बनाई। मणिकर्णिका सम्मान समारोह आयोजन समिति ने गणमान्य नागरिकों से अपनी बेटियों के साथ कार्यक्रम में शामिल होने का अनुरोध किया है।