कोयले के अभाव में रूका नेपा मिल का पेपर उत्पादन

केंद्र सरकार से 674 करोड़ की वित्तीय राहत की मांग । कोयले के अभाव में रूका नेपा मिल का पेपर उत्पादन। दोनों पेपर मशीनें तैयार, सालाना एक लाख टन न्यूजप्रिंट बनाने की क्षमता; 247 करोड़ का ऋण पर 427 करोड़ का ब्याज माफ किया जाना चाहिए। सांसद ज्ञानेश्वर पाटील को यूनियन ने लिखा पत्र।

*सारनी* बैतूल (मध्यप्रदेश) कोयले की कमी के कारण सार्वजनिक क्षेत्र की नेपा लिमिटेड में न्यूजप्रिंट का उत्पादन एक बार फिर ठप हो गया है। खास बात यह है कि श्रमिकों और कर्मचारियों ने छह माह की मेहनत से दोनों पेपर मशीनों को उत्पादन के लिए तैयार किया था और मिल में लगातार एक माह तक सफलता पूर्वक उत्पादन भी हुआ। अब नियमित कोयला आपूर्ति और कार्यशील पूंजी के अभाव में तैयार मशीनों का पूरा उपयोग नहीं हो पा रहा है। नेपा मिल को आर्थिक संकट से उबारने के लिए करीब 247 करोड़ रुपए के सरकारी ऋण और उस पर लगभग 427 करोड़ रुपए के ब्याज की माफी की मांग उठ रही है। इस तरह कुल 674 करोड़ रुपए की वित्तीय राहत मिलने पर मिल के लिए वाणिज्यिक वित्तीय संस्थानों से कार्यशील पूंजी जुटाने का रास्ता आसान हो सकता है।

वार्षिक बैलेंस शीट के आंकड़ों के अनुसार, मिल पर करीब 1,055 करोड़ रुपए का संचित घाटा है। वहीं, वर्तमान में सालाना लगभग 57 करोड़ रुपए ब्याज का भार बताया जा रहा है। नेपा मिल के सामने चुनौती यह है कि उत्पादन नियमित नहीं होने से आय सीमित है, जबकि वित्तीय देनदारियों और संचालन संबंधी खर्चों का दबाव बना हुआ है। नेपा मिल के वर्तमान प्रबंध संचालक नरेश सिंह के पदभार ग्रहण करने केर बाद नेपा मिल की स्थिती तकनीकी दृष्टि से सुदृढ हुई है। पहले के प्रबंध संचालक नेपा मिल को विकास के रास्ते पर वापस लाने में सफल नहीं हुए। नरेश सिंह ने 23 मई 2026 को नेपानगर के विट्ठल मंदिर परिसर में भागवत कथा के समापन पर उपस्थित जन समुदाय को आश्वस्त किया था, कि नेपा मिल को उत्पादन करने योग्य बनायेगें । टीम वर्क के कारण प्रबंधन सफल भी हुआ है। भारत सरकार के उद्योग मंत्रालय को अब वित्तीय सहायता तत्काल प्रदान करना चाहिए। जिससे नेपा मिल के श्रमिकों और कर्मचारियों ने आंतरिक संसाधनों से दोनों पेपर मशीनों की मरम्मत, रखरखाव और अनुरक्षण का काम पिछले 6 माह में पूरा किया। इसके बाद मिल में लगातार एक माह तक अखबारी पेपर का उत्पादन हुआ। सीमित संसाधनों के बीच कर्मचारियों के वेतन, बिजली बिल,जरूरी खर्चों और आपूर्तिकर्ताओं के भुगतान की व्यवस्था भी की जाती रही।

दोनों मशीनों की एक लाख मीट्रिक टन न्यूजप्रिंट सालाना बनाने की क्षमता है। इसके बावजूद कोयले की नियमित उपलब्धता नहीं होने से उत्पादन रोकना पड़ा। प्रबंधन के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती पर्याप्त कोयले की व्यवस्था कर उत्पादन को दोबारा नियमित करना है।

*दिल्ली से नागपुर तक कोयले की आपूर्ति के प्रयास* विद्युत मंडल कर्मचारी यूनियन मध्यप्रदेश के क्षेत्रीय महामंत्री अंबादास सूने ने नेपा मिल को पर्याप्त कोयले की आपूर्ति के लिए केंद्रीय कोयला मंत्री के साथ ही खण्डवा सांसद ज्ञानेश्वर पाटील को पत्र लिखा है। कोयले की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए नेपा मिल प्रबंधन भी नई दिल्ली में भारी उद्योग मंत्रालय के अधिकारियों के साथ बैठकें करने के साथ ही साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड और वेस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड नागपुर के वरिष्ठ अधिकारियों से भी संपर्क किया। नेपा मिल ने कोयला मंत्रालय से भी सहयोग मांगा है। *दस साल उत्पादन बंद रहा, 16% ब्याज पर लिए कर्ज से बढ़ा बोझ*

वर्ष 2012 से 2022 के बीच करीब दस साल तक उत्पादन बंद रहने के दौरान भी मिल पर कई स्थायी खर्चों की जिम्मेदारी बनी रही। वेतन, बिजली बिल, नगर की पेयजल व्यवस्था, साफ-सफाई, शिक्षा और चिकित्सालय जैसी सुविधाओं से जुड़े खर्चों के लिए मिल को 16 प्रतिशत ब्याज दर पर ऋण लेना पड़ा। इससे वित्तीय दबाव बढ़ता गया और संचित घाटा करीब 1,055 करोड़ रुपए तक पहुंच गया। वर्तमान में लगभग 57 करोड़ रुपए सालाना ब्याज का भार बताया जा रहा है। इस स्थिति में कार्यशील पूंजी के लिए वाणिज्यिक बैंकों से नया ऋण जुटाना भी मुश्किल हो रहा है। ऐसे में करीब 247 करोड़ रुपए के सरकारी ऋण और लगभग 427 करोड़ रुपए के ब्याज की माफी से वित्तीय स्थिति सुधारने में मदद मिल सकती है। इसके बाद वाणिज्यिक वित्तीय संस्थानों से कार्यशील पूंजी जुटाने की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।

नेपा लिमिटेड का संचालन केवल औद्योगिक उत्पादन तक सीमित नहीं है। इसका सीधा और अप्रत्यक्ष असर नेपानगर नगर पालिका परिषद क्षेत्र सहित आसपास के करीब 80 गांवों की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। मिल से प्रत्यक्ष रोजगार के अलावा परिवहन, आपूर्तिकर्ताओं, दुकानदारों और छोटे कारोबारियों को भी काम मिलता हैं।

*न्यूजप्रिंट आयात पर निर्भरता घटाने की क्षमता*

उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, देश में न्यूजप्रिंट की करीब 60 प्रतिशत जरूरत आयात से पूरी होती है, जबकि लगभग 40 प्रतिशत आपूर्ति घरेलू उत्पादन से होती है। ऐसे में नेपा लिमिटेड की सालाना एक लाख मीट्रिक टन उत्पादन क्षमता का पूरा उपयोग होने पर घरेलू आपूर्ति बढ़ाने और आयात पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है। इससे विदेशी मुद्रा की बचत की संभावना भी है। सन 1985 के काल में अखबारी पेपर जैसे स्याही सोक जैसा बनता था। आज गुणवत्ता पूर्ण पेपर का उत्पादन किया जा रहा है।तत्कालीन वित्त मंत्री मनमोहन सिंह की आर्थिक उदारीकरण की नीति ने 1991 औद्योगिक क्षेत्र को नुकसान पहुंचया है। पहले बांस और सलई की लुगदी से पेपर तैयार होता था। आज

पुराने कागज की रद्दी को रिसाइकल कर नया कागज बनाने की क्षमता भी मिल की महत्वपूर्ण विशेषता है। इससे कागज के पुनः उपयोग और संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल को बढ़ावा मिल सकता है।

*कोयला, कार्यशील पूंजी और बकाया भुगतान पर टिकी उम्मीद*

एक माह तक सफल उत्पादन का अनुभव मिलने के बावजूद कोयले की कमी ने मिल की रफ्तार रोक दी है। करीब 247 करोड़ रुपए के सरकारी ऋण को इक्विटी में बदलने, 427 करोड़ रुपए के ब्याज की माफी, पर्याप्त कार्यशील पूंजी और नगर पालिका से बकाया राशि मिलने से मिल को राहत मिल सकती है।

अब मिल का उत्पादन नियमित करने के लिए कोयले की आपूर्ति और वित्तीय सहयोग दोनों जरूरी हैं। इन व्यवस्थाओं के बिना उत्पादन क्षमता का पूरा उपयोग करना और मिल को आर्थिक रूप से स्थिर बनाना चुनौती बना रहेगा।

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