हिंदू आश्रम तोड़ने वाली सरकार हिंदुत्व की हो सकती है ?

Ashish ugade

सारनी—- क्या एक खेल के मैदान के लिए दशकों पुराना धार्मिक स्थल मिटाया जा सकता है? यही सवाल आज पूरे संत समाज और आम जनों को झकझोर रहा है।

अहमदाबाद के मोटेरा में स्थित आशाराम बापू का आश्रम इन दिनों एक बड़े चर्चा के केंद्र में है। गुजरात सरकार इस आश्रम की भूमि को वापस लेकर वहाँ ओलंपिक-स्तरीय स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स बनाना चाहती है। लेकिन देशभर के अखाड़ों के संत-महंत एकजुट होकर इस फैसले का विरोध कर रहे हैं।

गुजरात हाईकोर्ट ने अप्रैल 2025 में एक चौंका देनेवाला फैसला सुनाया। कोर्ट ने राज्य सरकार को अनुमति दी कि वह मोटेरा स्थित संत आशाराम बापू आश्रम की लगभग 45,000 वर्ग मीटर भूमि वापस ले सके। यह ज़मीन एक बड़े 650 एकड़ के उस क्षेत्र का हिस्सा है जिसे सरदार पटेल स्पोर्ट्स एन्क्लेव के लिए चिन्हित किया गया है। इसे 2036 ओलंपिक की मेजबानी की दावेदारी और 2030 कॉमनवेल्थ गेम्स की तैयारियों से जोड़कर देखा जा रहा है। सरकार का कहना है कि आश्रम ने 1980 में आवंटित मूल 6,261 वर्ग मीटर से अधिक भूमि पर अतिक्रमण किया है। आश्रम पक्ष इससे इनकार करता है और इस कार्रवाई को गैरकानूनी बताता है।

 

*आश्रम का इतिहास और सामाजिक योगदान*

आशारामजी बापू आश्रम पाँच दशकों से न केवल एक धार्मिक केंद्र रहा है, बल्कि यहाँ गुरुकुल, निःशुल्क शिक्षा, महिला उत्थान और गरीब छात्रों के लिए अनेक सेवा-कार्य भी निरंतर चलते आए हैं।

*महामंडलेश्वर महंत श्री दिलीपदासजी, अध्यक्ष, अ.भा. संत समिति, गुजरात*, कहते हैं —

“बापूजी तो सेवा की मूर्ति हैं। उन्होंने लोगों को धर्म के साथ जोड़ने का भगीरथ कार्य किया है।”

यह आश्रम देश-विदेश में फैले आश्रमों का मूल केंद्र माना जाता है। करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था इस स्थान से जुड़ी हुई है।

 

*अखाड़ों के संतों ने क्या कहा मोटेरा आश्रम केस के बारे में ?*

देश के प्रमुख अखाड़ों के संत-महंत इस मुद्दे पर एकजुट होकर सामने आए हैं। उनकी आवाज़ सिर्फ एक आश्रम बचाने की नहीं, बल्कि सनातन धर्म की रक्षा की है।

“खेल का मैदान कहीं भी बन सकता है, आश्रम नहीं”

*श्रीमहंत रविन्द्रपुरीजी, सचिव, श्री पंचायती अखाड़ा महानिर्वाणी*, ने सीधा सवाल उठाया — एक महीने के खेल आयोजन के लिए करोड़ों लोगों की दशकों पुरानी आस्था को क्यों तोड़ा जाए? विदेशी मेहमान आएंगे और चले जाएंगे, लेकिन यह आश्रम तो पीढ़ियों से लोगों की श्रद्धा का केंद्र है।

*महंत सूर्यांश मुनिजी, श्री पंचायती अखाड़ा बड़ा उदासीन*, ने सरकार से निवेदन किया —

सनातनी तथा संत-महात्मा मानते हैं कि यह सरकार हमारी है तो जब हमारे आश्रम टूटेंगे तो हमारी सरकार कैसे रह जायेगी ?

*बाबा बलरामदास हठयोगीजी, राष्ट्रीय महामंत्री, अ.भा. वैष्णव अखाड़ा परिषद*, ने भी इसी भावना को दोहराते हुए कहा कि राष्ट्र तभी बचेगा जब अध्यात्म जीवित रहेगा। खेल के मैदान के लिए आध्यात्मिक केंद्र को बलिदान करना राष्ट्र की आत्मा को कमज़ोर करना है।

“धर्म का दोहन हो रहा है” — *महंत जगतार मुनिजी*

*महंत जगतार मुनिजी, महासचिव, श्री पंचायती अखाड़ा नया उदासीन (निर्वाण)*, ने बेहद तीखे शब्दों में सरकार से सवाल किया —

“कौन कहता है कि यह हिन्दुत्व की सरकार है? धरातल पर तो हमको ऐसा कुछ दिखाई नहीं देता, बल्कि धर्म का दोहन हो रहा है।”

उन्होंने स्पष्ट कहा कि हिंदू धर्म के आश्रम समाज-कल्याण और आध्यात्मिक उत्थान के लिए बनते हैं — मनोरंजन के लिए नहीं। धार्मिक स्थल का उपयोग धर्म के कार्यों में ही होना चाहिए।

*निर्मल पीठाधीश्वर श्रीमहंत स्वामी ज्ञानदेव सिंहजी* ने तो सरकार को सीधी चेतावनी दी — यदि सरकार इस तरह संतों को प्रताड़ित करती रही, तो हिंदू समाज इसे बर्दाश्त नहीं करेगा और इसकी जिम्मेदारी सरकार पर होगी।

*महामंडलेश्वर स्वामी संजय गिरिजी, पंचदशनाम जूना अखाड़ा*, ने कहा कि जो लोग धर्म के आधारस्तंभ हैं, उन्हें तोड़कर सनातन धर्म की रक्षा की बात करना विरोधाभास है। उन्होंने सभी से आश्रम की रक्षा में एकजुट होने का आह्वान किया ताकि भारत पुनः विश्वगुरु का दर्जा प्राप्त कर सके।

*सुप्रीम कोर्ट ने लगाई रोक — क्या है कानूनी स्थिति?*

इस मुद्दे ने देश की सर्वोच्च अदालत का दरवाजा खटखटाया और वहाँ से आश्रम को बड़ी राहत मिली। 27 अप्रैल 2026 को सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने गुजरात सरकार की कार्रवाई पर रोक लगा दी। कोर्ट ने यथास्थिति (Status Quo) बनाए रखने का आदेश दिया और गुजरात हाईकोर्ट के 17 अप्रैल के उस फैसले पर भी रोक लगाई जिसमें सरकार को भूमि वापस लेने की अनुमति दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के शो-कॉज़ नोटिस को लेकर गंभीर सवाल उठाए। पीठ ने कहा कि नोटिस में आवश्यक तथ्यात्मक जानकारी का अभाव है और यह प्रथम दृष्टया अपूर्ण प्रतीत होता है। कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि जो भूमि पहले अतिक्रमण बताई जा रही थी, उसे बाद में नियमित भी किया गया था — तो रातोंरात यह फैसला क्यों बदला गया? आश्रम की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने इस कार्रवाई को गैरकानूनी और दुर्भावनापूर्ण बताया। मामले की अगली सुनवाई जुलाई में है।

*करोड़ों भक्तों की आस्था का सवाल* यह सवाल केवल ज़मीन का नहीं है। यह उन करोड़ों लोगों की भावनाओं का सवाल है जो दशकों से इस आश्रम से जुड़े हैं, जिन्होंने यहाँ साधना-सेवा की, जिनके जीवन इस केंद्र से प्रेरणा लेते रहे हैं। *महामंडलेश्वर डॉ. सुमनानंद गिरिजी, निरंजनी अखाड़ा*, ने इस पूरे प्रकरण को बड़े परिप्रेक्ष्य में रखा। उन्होंने कहा कि धर्मांतरण को रोकने का जितना काम संत आशारामजी ने किया, उतना किसी और ने नहीं किया — और यही उनके विरोध की असली वजह है।

*महामंडलेश्वर श्रीमहंत गंगादासजी, बड़ा उदासीन अखाड़ा*, ने इसे और सरल शब्दों में रखा — जहाँ संतों का आवागमन होता है, वह स्थान स्वतः तीर्थ बन जाता है। ऐसे स्थान को उजाड़ना सनातन धर्म के सर्वथा विरुद्ध है।

*श्री गौरीशंकर गिरिजी, प्रवक्ता, श्री तपोनिधि आनंद अखाड़ा पंचायती*, ने स्पष्ट कहा कि यह आश्रम युवा पीढ़ी में मर्यादा और संयम की भावना जागृत करता है। आज के दौर में देश को ऐसे केंद्रों की सबसे अधिक ज़रूरत । सरकार के पास पर्याप्त अन्य भूमि उपलब्ध है। आश्रम की भूमि पर ऐसी कोई संरचना न

सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल यथास्थिति का आदेश देकर इस मुद्दे पर विराम लगाया है। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या सरकार संत समाज की भावनाओं का सम्मान करते हुए कोई मार्ग निकालेगी?

यह न केवल एक आश्रम का मामला है — यह भारत की सांस्कृतिक पहचान और सनातन धर्म की जड़ों की रक्षा करना चाहिए। योग वेदांत समिती केंद्र सरकार और गुजरात सरकार से आग्रह करती है कि सनातन धर्म की रक्षा के लिए संत समाज को सहयोग करे और खेल मैदान अन्य स्थान पर बनाये।

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