विश्व पटल पर चमकता,आस्था, भक्ति एवं श्रद्धा का केंद्र “अग्रोहा शक्तिपीठ तीर्थ स्थल

भगवान श्रीराम के वंशज, महालक्ष्मी जी के कृपापात्र, कलयुग के अवतारी, गरीबों के मसीहा, अग्रोहा नरेश भगवान श्री अग्रसेन जन्मोत्सव” के शुभ अवसर पर स्वर्ग से सुंदर एवं भव्य सज गया अग्रोहा शक्तिपीठ 

देश की राजधानी दिल्ली से 185 किलोमीटर की दूरी पर नेशनल हाईवे संख्या -9 पर हिसार जिले के गांव अग्रोहा का इतिहास महाभारत काल से रहा है। महाराजा अग्रसेन के द्वारा निर्मित इस गांव का इतिहास काफी पुराना है।अग्रोहा धाम का निर्माण 1976 से प्रारंभ किया गया जो आज भी जारी है। अग्रोहा धाम को तीन भागों में बांटा गया है बीच वाला भाग मां लक्ष्मी व पूर्वी हिस्सा महाराजा अग्रसेन व पश्चिमी हिस्सा मां सरस्वती को समर्पित है। मंदिर के पिछले हिस्से में बारह ज्योर्तिलिंग से बना रामेश्वर धाम बना है। मंदिर के बीच में सरोवर का निर्माण किया गया है, जिसको 41 पवित्र नदियों के जल के साथ पावन किया गया है। वैसे तो हर रोज ही धाम में पर्यटकों का जमावड़ा लगा रहता है, लेकिन शरद पूर्णिमा के अवसर पर हर साल अग्रोहा धाम में मेला लगता है, जिसमें देशभर से लाखों पर्यटक धाम को देखने आते है।अग्रवंशों का पावन धाम है अग्रोहा
अग्रवाल समाज अग्रोहा धाम को अपना पावन धाम मानता है। धाम में काफी दर्शनीय स्थल हैं, जिनमें मंदिर परिसर में कृष्ण लीला की झांकी, गजमुक्तेश्वर झांकी, जमीन के 15 फुट नीचे मां वैष्णो देवी गुफा, तिरुपति बालाजी, भैरवनाथ, बाबा अमरनाथ के साथ-साथ हनुमान जी की 90 फुट ऊंची प्रतिमा शामिल है।
अग्रोहा टीले में छिपा महाभारत काल का इतिहास
महाभारत के युद्ध के पश्चात महाराजा अग्रसेन द्वारा अग्रोहा को अपनी राजधानी बनाया गया। यहां कई एकड़ में फैले टीले की यदि खुदाई की जाए तो आज भी महाभारत कालीन अवशेषों को प्राप्त किया जा सकता है।
मंदिर खुलने का समय
वैसे तो मंदिर परिसर में बने अलग-अलग मंदिरों में आरती का समय सुबह पांच बजे प्रारंभ हो जाता है, जो दो घंटों तक चलता है। आरती होने के बाद मंदिर परिसर को पर्यटकों के लिए सुबह सात बजे खोल दिया जाता है जो रात के आठ बजे तक दर्शन कर सकते हैं।

 

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