18 नवंबर को मनाया जाएगा 9वाँ राष्ट्रीय प्राकृतिक चिकित्सा दिवस

 

पंचमहाभूतों पर आधारित प्राकृतिक चिकित्सा से स्वस्थ जीवन का संदेश, जन-जागरूकता बढ़ाने पर जोर

रानीपुर (बैतूल)। प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित कर स्वस्थ जीवन जीने की भारतीय परंपरा और प्राकृतिक चिकित्सा के महत्व को जन-जन तक पहुँचाने के उद्देश्य से आगामी 18 नवंबर को देशभर में 9वाँ राष्ट्रीय प्राकृतिक चिकित्सा दिवस मनाया जाएगा। इस अवसर पर प्राकृतिक चिकित्सा के सिद्धांतों, उपचार पद्धतियों, रोगों की रोकथाम और स्वस्थ जीवनशैली के प्रति जन-जागरूकता बढ़ाने पर विशेष जोर दिया जा रहा है।

वर्तमान समय में बदलती जीवनशैली, अनियमित दिनचर्या, असंतुलित खानपान, शारीरिक गतिविधियों की कमी, मानसिक तनाव और प्रदूषण के कारण मोटापा, मधुमेह, उच्च रक्तचाप एवं हृदय संबंधी बीमारियों जैसी स्वास्थ्य समस्याएँ तेजी से बढ़ रही हैं। ऐसे समय में प्राकृतिक चिकित्सा स्वास्थ्य संरक्षण और रोगों की रोकथाम के प्रति जागरूकता विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

पंचमहाभूतों पर आधारित है प्राकृतिक चिकित्सा

प्राकृतिक चिकित्सा का आधार प्रकृति के पाँच महाभूतों पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश के सिद्धांतों पर आधारित है। इसमें मिट्टी चिकित्सा, जल चिकित्सा, सूर्य चिकित्सा, वायु चिकित्सा, आहार चिकित्सा, उपवास चिकित्सा, योग एवं प्राणायाम जैसी विभिन्न उपचार पद्धतियों का उपयोग किया जाता है। इसके अतिरिक्त एक्यूपंक्चर, एक्यूप्रेशर, कपिंग चिकित्सा, रंग चिकित्सा और चुंबकीय चिकित्सा जैसी तकनीकों का भी आवश्यकता एवं उपयुक्तता के अनुसार उपयोग किया जाता है।

प्राकृतिक चिकित्सा में व्यक्ति के स्वास्थ्य के सभी पहलुओं पर ध्यान दिया जाता है। इसमें शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक स्वास्थ्य को महत्व देते हुए व्यक्ति की दिनचर्या, खानपान, शारीरिक गतिविधियों और जीवनशैली का मूल्यांकन किया जाता है। इसका उद्देश्य स्वस्थ आदतों को विकसित करना तथा शरीर की स्वाभाविक स्वास्थ्य संरक्षण क्षमता को सहयोग प्रदान करना है।

इस संबंध में डॉ. नवीन वागद्रे (BNYS), निदेशक – संत श्री निक्कूदास प्राकृतिक चिकित्सा एवं वेलनेस सेंटर, रानीपुर तथा प्रांत प्राकृतिक चिकित्सा प्रमुख – गौ ग्राम संस्कृति संरक्षण समिति का कहना है कि प्राकृतिक चिकित्सा केवल रोगों के उपचार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति के संपूर्ण स्वास्थ्य पर केंद्रित एक समग्र जीवनशैली है। वर्तमान समय में लोगों को रोगों की रोकथाम, संतुलित आहार, नियमित योग और प्राकृतिक जीवनशैली के प्रति जागरूक करना आवश्यक है।

प्राकृतिक चिकित्सा के विकास में महात्मा गांधी का योगदान

भारतीय प्राकृतिक चिकित्सा के इतिहास में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का योगदान विशेष महत्व रखता है। गांधीजी प्राकृतिक चिकित्सा के प्रबल समर्थक थे। उन्होंने अपने जीवन में उपवास, मिट्टी चिकित्सा, जल चिकित्सा, सूर्य स्नान और प्राकृतिक आहार जैसी पद्धतियों को विशेष स्थान दिया। उनका मानना था कि प्रकृति के नियमों के अनुरूप जीवन जीना स्वस्थ रहने का महत्वपूर्ण आधार है।

18 नवंबर 1945 को महात्मा गांधी अखिल भारतीय प्राकृतिक चिकित्सा फाउंडेशन ट्रस्ट के आजीवन अध्यक्ष बने और उन्होंने इसके विलेख पर हस्ताक्षर किए। इसी ऐतिहासिक घटना की स्मृति में भारत सरकार के आयुष मंत्रालय ने वर्ष 2018 से प्रत्येक वर्ष 18 नवंबर को राष्ट्रीय प्राकृतिक चिकित्सा दिवस मनाने का निर्णय लिया। इस दिवस का उद्देश्य प्राकृतिक चिकित्सा के प्रति जागरूकता बढ़ाना और इसे आमजन तक पहुँचाना है।

विद्यार्थियों एवं युवा चिकित्सकों की भूमिका महत्वपूर्ण

प्राकृतिक चिकित्सा के प्रचार-प्रसार में विद्यार्थियों, चिकित्सकों, शिक्षकों और शोधकर्ताओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। राष्ट्रीय प्राकृतिक चिकित्सा दिवस को केवल औपचारिक आयोजन तक सीमित न रखते हुए इसे व्यापक जन-जागरूकता अभियान के रूप में मनाने की आवश्यकता है।

इस अवसर पर देशभर के प्राकृतिक चिकित्सा विद्यार्थियों एवं युवा चिकित्सकों से अधिक से अधिक जागरूकता वीडियो बनाने, सामाजिक माध्यमों पर जानकारीपूर्ण पोस्ट साझा करने, विद्यालयों एवं महाविद्यालयों में स्वास्थ्य व्याख्यान आयोजित करने तथा निःशुल्क स्वास्थ्य जागरूकता शिविर, योग सत्र और जनसंपर्क कार्यक्रम आयोजित करने का आह्वान किया गया है।

इसके साथ ही प्राकृतिक चिकित्सा के क्षेत्र में वैज्ञानिक अनुसंधान, प्रमाण आधारित चिकित्सा पद्धतियों और नवीन तकनीकों को प्रोत्साहित करना भी आवश्यक है, ताकि आमजन तक इसकी सही एवं विश्वसनीय जानकारी पहुँच सके।

स्वस्थ समाज के निर्माण में सामूहिक भागीदारी आवश्यक

प्राकृतिक चिकित्सा का उद्देश्य केवल रोगों का उपचार करना नहीं, बल्कि लोगों को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक बनाना और संतुलित जीवनशैली अपनाने के लिए प्रेरित करना भी है। इसके लिए सामाजिक संगठनों, प्राकृतिक चिकित्सा संस्थानों, चिकित्सकों, विद्यार्थियों और आम नागरिकों की सामूहिक भागीदारी आवश्यक है।

प्राकृतिक चिकित्सा के सिद्धांतों को समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुँचाकर स्वस्थ जीवनशैली और रोगों की रोकथाम के प्रति जागरूकता बढ़ाई जा सकती है। राष्ट्रीय प्राकृतिक चिकित्सा दिवस हमें प्रकृति के महत्व को समझने और स्वास्थ्य के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाने का संदेश देता है।

प्रकृति के साथ सामंजस्य, संतुलित आहार, नियमित योग और अनुशासित जीवनशैली ही स्वस्थ एवं जागरूक समाज के निर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।

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