अग्रसेन जयंती महोत्सव को लेकर बैठक

अग्रवाल समाज के जनक महाराजा अग्रसेन जी की जयंती उत्सव हर्षोल्लास के साथ बनाने के लिए घोड़ाडोंगरी अग्रवाल समाज की बैठक आज गुरुवार 28 सितंबर को रात 8:00 बजे से अग्रसेन भवन घोड़ाडोंगरी में आयोजित की गई है।  15 अक्टूबर को महाराजा अग्रसेन जी का जयंती महोत्सव है महोत्सव के उपलक्ष में होने वाले कार्यक्रमों की रूपरेखा सहित अन्य मुद्दों विषयों पर सभी सामाजिक बन्धुओं की भागीदारी सुनिश्चित करने आपसी सलाह विचार कर रूपरेखा बनाने को लेकर बैठक आयोजित की गई है

जाने महाराज अग्रसेन के बारे में

महाराजा अग्रसेन दया और करुणा के लिए जाने जाते थे और उनको अग्रवाल समाज के जनक की ख्याति प्राप्त है। इनका जन्म क्षत्रिय कुल में हुआ था, लेकिन इन्हें पशुओं की बलि से बहुत ही नफरत थी। इसी कारण इन्होने क्षत्रिय धर्म का त्याग कर दिया था और वैश्य धर्म धर्म को अपना दिया था।

समाज सुधारक, युगपुरुष, महादानी, लोकनायक, बलि प्रथा को रोकने वाले महाराजा अग्रसेन का जन्म अश्विन शुक्ल प्रतिपदा को हुआ था। शारदीय नवरात्रि के पहले दिन को पूरा वैश्य समाज बड़ी ही धूमधाम से महाराजा अग्रसेन की जयंती को मानते है। महाराजा अग्रसेन की याद में महाराजा अग्रसेन जयंती मनाई जाती है।

इनके नाम पर अग्रवाल समाज ने जगह-जगह पानी की प्याऊ, अस्पताल, धर्मशाला, स्कूल, कॉलेज, उद्यान, विचरण स्थल बनाए हुए है। एक मान्यता के अनुसार अग्रवाल समाज का जनक महाराजा अग्रसेन को माना जाता है। महाराजा अग्रसेन उन विभूतियों में से थे जो सभी के हित और सभी के सुख जैसे कार्यों द्वारा युगों-युगों तक अमर और याद किए जाएंगे।

महाराजा अग्रसेन जीवन परिचय व इतिहास

Maharaja Agrasen History in Hindi:  दोस्तों, आज हम इस लेख में महाराजा अग्रसेन के बारे में जानेंगे। महाराजा अग्रसेन दया और करुणा के लिए जाने जाते थे और उनको अग्रवाल समाज के जनक की ख्याति प्राप्त है। इनका जन्म क्षत्रिय कुल में हुआ था, लेकिन इन्हें पशुओं की बलि से बहुत ही नफरत थी। इसी कारण इन्होने क्षत्रिय धर्म का त्याग कर दिया था और वैश्य धर्म धर्म को अपना दिया था।

Maharaja Agrasen History in Hindi: समाज सुधारक, युगपुरुष, महादानी, लोकनायक, बलि प्रथा को रोकने वाले महाराजा अग्रसेन का जन्म अश्विन शुक्ल प्रतिपदा को हुआ था। शारदीय नवरात्रि के पहले दिन को पूरा वैश्य समाज बड़ी ही धूमधाम से महाराजा अग्रसेन की जयंती को मानते है। महाराजा अग्रसेन की याद में महाराजा अग्रसेन जयंती मनाई जाती है।

इनके नाम पर अग्रवाल समाज ने जगह-जगह पानी की प्याऊ, अस्पताल, धर्मशाला, स्कूल, कॉलेज, उद्यान, विचरण स्थल बनाए हुए है। एक मान्यता के अनुसार अग्रवाल समाज का जनक महाराजा अग्रसेन को माना जाता है। महाराजा अग्रसेन उन विभूतियों में से थे जो सभी के हित और सभी के सुख जैसे कार्यों द्वारा युगों-युगों तक अमर और याद किए जाएंगे।

महाराजा अग्रसेन जी का जन्म द्वापर युग के अंत और कलयुग के शुरुआत के मध्य आश्विन शुक्ल प्रतिपदा यानि शारदीय नवरात्रि के पहले दिन को हुया था। उनके जन्मदिन को अग्रवाल समाज द्वारा बड़े ही धूमधाम से अग्रसेन जयंती के रूप में मनाया जाता है। समाज वाले जयंती के आने से पूर्व ही जुट जाते है, इनके जयंती के दिन बहुत सारे धार्मिक अनुष्ठान, स्कूल-कॉलेज में प्रतियोगिता इत्यादि की जाती है।

महाराजा अग्रसेन प्रताप नगर के राजा वल्लभ और रानी भगवती के यहाँ ज्येष्ठ पुत्र के रूप में जन्म लिया था। इनका जन्म सूर्यवंशी क्षत्रिय कुल में हुआ था। इनके अनुज भाई के नाम शूरसें था। जिन्होंने बाद में अग्रवाल समाज के साथ-साथ अग्रोहा धाम की स्थापना की थी।

इनके बारे में ये भी कहा जाता है कि इनके जन्म के समय ही महान गर्ग ऋषि ने उनके पिता श्री वल्लभ से कह दिया था कि अग्रसेन जी आगे चलकर बहुत बड़े शासक बनेंगे और उनके राज्य में एक नई शासन व्यवस्था उदय होगी और युगों-युगों तक इनका नाम अमर रहेगा।

अग्रसेन महाराज का विवाह
अग्रसेन जी के दो विवाह हुए थे। पहली शादी नागराज की बेटी माधवी से और दूसरी शादी नागवंशी की पुत्री सुंदरावती से की थी। इनकी पहली शादी स्वयंवर के जरिए हुई थी। राजा नागराज के यहाँ आयोजित इस स्वयंवर में दूर-दराज से राजा-महाराजाओं के साथ-साथ स्वयं स्वर्ग लोक से इन्द्र देवता भी आए थे, लेकिन राजकुमारी माधवी ने महाराजा अग्रसेन को अपने वर में चुना था।

राजा इन्द्र इसे अपना अपमान मान बैठे और क्रोधित हो उठे। अपनें क्रोध का प्रकोप प्रतापनगर के नगरवासियों को उठाना पड़ा, इन्द्र देव ने प्रतापनगर में बारिश की एक बूँद भी नहीं बरसाई। नतीजजन प्रतापनगर में भयंकर अकाल पड़ गया और चारों तरफ त्राहिमाम मच गया। अपने नगरवासियों की ऐसी हालात देख कर अग्रसेन जी और उनके छोटे भाई शूरसेन ने अपने प्रतापी और दिव्य शक्तियों के पराक्रम से राजा इन्द्र से घमासान युद्ध लेने का फैसला लिया।

अग्रसेन जी का पलड़ा भारी और विजय सुनिश्चित होते देख देवताओं और नारद मुनि ने इन्द्र देव और महाराज अग्रसेन के बीच संधि प्रस्ताव को रखा और सुकलह करवा दी गई। लेकिन इन्द्र देव अपने अपमान को याद कर कर के प्रताप नगर के रहवासियों को ले लिए कोई न कोई मुसीबत खड़ी कर ही देते थे।

इन्द्र देव की बीमारी को जड़ से हटाने के लिए अग्रसेन जी ने हरियाणा और राजस्थान के बीच बहने वाली सरस्वती नदी के किनारे भगवान शंकर की तपस्या करने चले गए। शंकर जी ने उनकीं तपस्या से प्रसन्न हो कर उन्हे बताया कि महादेवी लक्ष्मी की उपासना करें वो आपको सही मार्ग बताएगी।

भोलेनाथ के कहे अनुसार अग्रसेन जी लक्ष्मी देवी की तपस्या करने में जुट गए और इन्द्र देव इनकी तपस्या भंग करने में आखिरकार अग्रसेन जी की तपस्या से प्रसन्न हो कर दर्शन दिए और उन्हें बताया कि अगर वे कोलपुर के राजा महीरथ (नागवंशी) की पुत्री सुंदरावती से विवाह कर लेंगे तो उन्हें उनकी सभी शक्तियां प्राप्त जो जायेंगी, जिसके चलते इन्द्र देव उनसे आमना-सामना करने से पहले कई बार सोचना पड़ेगा। इसके साथ देवी लक्ष्मी ने नए राज्य की स्थापना निडर होकर करने का भी हुक्म दिया। इसलिए महाराजा अग्रसेन जी ने सुंदरावती से विवाह कर प्रतापनगर को संकट से बचाया।

अग्रवाल जाति का उद्गम
क्षत्रिय कुल में जन्मे अग्रसेन जी ने पूजा और धार्मिक अनुष्ठानों में पशु बलि की निंदा करते हुए अपना धर्म त्यद गैया था एवं नए वैश्य धर्म की स्थापना की थी। इसी वजह से वे अग्रवाल समाज के जनक हुए। इसको व्यवस्थित करने के लिए अठारह (18) यज्ञ किए गए थे और उन्हीं के अनुसार गौत्र बने थे।

महाराज अग्रसेन के 18 पुत्र थे और उन सभी पुत्रों को अठारह ऋषि मुनियों ने यज्ञ करवाए। वहीं 18 वें यज्ञ में जब पशु की बलि होने वाली थी तब अग्रसेन जी ने जमकर विरोध किया और वो अंतिम बलि नहीं होने दी।

अग्रसेन महाराज के गोत्र (Agrasen Maharaj Gotra)
अग्रवाल समाज के 18 गोत्र इस प्रकार हैं- एरोन / एरन, बंसल, बिंदल / विंदल, भंडल, धारण / डेरन, गर्ग / गर्गेया, गोयल / गोएल / गोएंका, गोयन / गंगल, जिंदल, कंसल, कुछल / कुच्चल, मधुकुल / मुग्दल, मंगल, मित्तल, नंगल / नागल, सिंघल / सिंगला, तायल और तिंगल / तुन्घल है। इस प्रकार बनी वैश्य समाज ने पैसे कमाने के रास्ते बनाए और आज तक यह जाति व्यापार के लिए जानी जाती है।

अग्रसेन महाराज का अंतिम समय
अपने राज्य में सब कुछ कर के राजा अग्रसेन ने अपना पूरा राज्य अपने ज्येष्ठ पुत्र विभु को सौंपकर स्वयं वन में तपस्या करने चले गए। अग्रसेन महाराज ने लगभग 100 सालों तक राज़ किया था। इन्हें न्यायप्रियता, दयालुता के कारण इतिहास के पन्नों में एक भगवान तुल्य स्थान दिया गया।

भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने इन पर कई किताबें लिखी थी, इनकी नीतियों पर अध्ययन करके एक अच्छा शासक बना जा सकता था। सन 29 सितंबर 1976 में इनके राज्य अग्रोहा (Agroha Dham Haryana) को धार्मिक धाम बनाया गया। इस धाम में अग्रसेन जी का बहुत बड़ा मंदिर भी बनाया गया है जिसकी स्थापना 1969 बंसत पंचमी के दिन की गई थी। इसे अग्रवाल समाज का तीर्थ भी कहते है।

अग्रसेन जयंती कब मनाई जाती हैं?
Agrasen Maharaj Jayanti in Hindi: महाराजा अग्रसेन जयंती आश्विन शुक्ल पक्ष प्रतिपदा अर्थात् नवरात्री के पहले दिन मनाई जाती हैं। महाराजा अग्रसेन जयंती के दिन कई सारे बड़े कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है और विधि विधान से पूजा पाठ किये जाते हैं।