बैतूल, किसी समय में बैतूल जैसे आदिवासी बाहुल्य जिले के साप्ताहिक बाजारो एवं मेलो में माता – पिता या परिवार के किसी बड़े बुर्जुग की मौजूदगी में छोटी उम्र में बच्चो के हाथ – पांव और सिर तथा मुख में गोदन करवाया जाता था। ऐसा करने के पीछे का मुख्य कारण यह रहता था कि शरीर को जहां – तहां गोदने से पराये पुरूष का आकर्षण कम होता था लेकिन वर्तमान दौर में गोदना की जगह ले चुकी पश्चिमी संस्कृति को बढ़ावा देने वाले टैटू बंद कमरे में माता – पिता परिवार के सदस्यो की गैर मौजूदगी में पराये मर्द के सामने बदन से कपड़े उतार कर अंध नंगे बदन पर उत्तेजक टैटू बनवाने का दौर चल पड़ा है। बैतूल जैसा आदिवासी बाहुल्य जिला शरीर अंतरंग हिस्सो एवं उत्तेजना को बढ़ावा देने वारले अंगो के आसपास टैटू बनवाने एवं उसके प्रदर्शन की बीमारी से बच नहीं पाएगा।
टैटू हमारी भारतीय आदिवासी गोदना कला संस्कृति का फूहड़ स्वरूप है। मुम्बई – दिल्ली जैसे महानगरो से बैतूल जैसे आदिवासी बाहुल्य बैतूल जिले के गंज क्षेत्र तक यदि दबे पांव टैटू संस्कृति अश£ीलता फैलाने के लिए पहुंच रही है तो निश्चीत है ऐसे में समाज में टैटू का फूहड़ प्रदर्शन करने पर सामाजिक अपराधो का ग्राफ बढ़ाने में मददगार साबित होगें। बैतूल जैसे जिले में चक्कर रोड़ से लेकर हमलापुर तथा कुछ पाश कालोनी यूं ही बदनाम है यहां पर होने वाली संदिग्ध गतिविधियो को लेकर ऐसे में बैतूल जिले में टैटू संस्कृति का दबे पांव आना समाज में अशलीलता को बढ़ावा दे सकता है। बैतूल जिला मुख्यालय पर लव जेहाद जैसे मामले दिन – प्रतिदिन बढऩे लगे है।
ऐसे में प्यार में धोखा और धोखे से प्यार के दौर से गुजर रहे बैतूल में आजादी के नाम पर टैटू संस्कृति का हाथ – पांव से होते हुए उत्तेजक अंगो तक पहुंचने में देरी नहीं लगेगी…? कुछ घरो में मेंहदी लगाने के लिए मेंहदी लगाने वाले युवको को बुलवाने का कई बार घातक प्रमाण देखने को मिल चुके है। नवधनाढ्य परिवारो से लेकर आम आदमी तक ऐसे प्रयोग एक दुसरे की नकल से बढऩे लगे है। जहां तक सनातन मे पंडित जी तो महिलाओं को तिलक भी स्वयं नहीं लगाते थे लेकिन बदलाव एवं परिर्वतन की आंधी ने अब समाज का इस मुकाम पर ला खड़ा किया है कि अब शादी – विवाह एंव पार्टी जैसे आयोजन में सबसे अलग दिखने एवं दिखाने की चाह ने अब साड़ी ब्लाउज इत्यादि पहनाने वालों की भी सेवाए ली जाने लगी है।
हालांकि बैतूल इस संस्कृति से बचता आया लेकिन अब खबर मिलने लगी है कि बैतूल में कुछ लोगो ने साड़ी ब्लाऊज पहनाने का काम शुरू कर दिया है। अब वह दिन दूर नहीं रहा जब बैतूल की तथाकथित नवधनाढ्य से लेकर आम परिवार की महिलाओ के टैटू बनवाने की इच्छाओ के चलते उनके बदन से धीरे – धीरे सरकने या उतरने वाले कपड़े या अतरंग वस्त्रो के बाद के वीडियो बाजार में दिखने को मिल जाए क्योकि बंद कमरे स्टूडियो में क्या होता है या क्या हो सकता है किसी से छुपा नहंी है।
वैसे भी भारत जैसे देश में दिल्ली से लेकर बैतूल तक महिलाओं – युवतियो को साड़ी पहनाने से लेकरए मेहंदी, सैलून, टेलर एवं टैटू जैसे सब काम पुरुष कर रहे हैं, उनमें भी अधिकांश गैर हिन्दू होते है। एक गैर पुरूष (दु:शासन) द्वारा पांडवो की जीवन संगनी द्रोपदी की साड़ी खींचने पर जिस देश में महाभारत हो गई थी उस भारत में स्त्री खुद साड़ी उतारने को खड़ी हो गई है। कहना एक प्रकार से कड़वा करेला के समान है कि आज औरतें स्वयं ही पुरुष से न केवल जिम में अपने निजी अंगों का स्पर्श सुख भोग रही है बल्कि साड़ी भी उतार पहन रही हैं।
आजादी के नाम पर सभी नियमों को नष्ट कर फूहड़ता की तरफ बढ़ता हमारा समाज स्वयं ही विनाश को आमंत्रित कर रहा है, हिन्दू राष्ट्र कीकल्पना को साकार रूप देने के लिए मरे जा रहे इस देश में आज हिन्दू लड़कियां, हिन्दू महिलाएं जेहादिओं की आसान शिकार बनती हैं। आजादी का सही अर्थ समझने की आवस्य्क्ता है , आजादी का अर्थ बदचलनी नहीं हो सकता, आजादी का अर्थ नंगापन नहीं हो सकता, आजादी के नाम पर समाज के मौलिक नियमो को छोड़ा नहीं जा सकता…!
हिन्दू समाज को आने बच्चों को उचित धर्म ज्ञान देने की जरूरत है, उन्हें अपनी संस्कृति से जोडऩे की जरूरत आन पड़ी है।







