मोक्ष की प्राप्ति के लिए ज़रूरी होती है मृत्यु । पर मृत्यु और मोक्ष के बीच एक जगह और आती है जिसे कहते
गंगा के बाएं किनारे पर स्थित, वाराणसी, हिंदुओं के सात पवित्र शहरों में से एक है। वामन पुराण के अनुसार, वरुण और अस्सी नामक दो नदियाँ समय की शुरुआत में ही उत्पन्न हुई थीं।
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वर्तमान नाम वाराणसी का उद्गम स्थल गंगा की दो सहायक नदियों, वरुण और अस्सी से ही है, जो इसकी उत्तरी और दक्षिणी सीमाओं को लहराती हैं। उनके बीच पड़ी भूमि का नाम ‘वाराणसी’ रखा गया था। वाराणसी का मूल नाम ‘काशी’, ‘काशा’ शब्द से लिया गया था, जिसका अर्थ है चमक। इसे अविमुक्ताका, आनंदकानन, महासमासन, सुरन्धना, ब्रह्म वर्धा, सुदर्शन और राम्या के नाम से भी जाना जाता है।
परंपरा और पौराणिक विरासत में डूबी, काशी को भगवान शिव और देवी पार्वती द्वारा निर्मित ‘मूल आधार ’माना जाता है।मगर इतिहास के हिसाब से देखे तो काशी की उत्पत्ति अभी तक अज्ञात है। वैसे वैदिक साहित्य में वाराणसी का उल्लेख कई स्थानों पर मिलता है। कौषीतकी उपनिषद में काश्यों और विदेहों के नाम का एक स्थान पर उल्लेख है। वृहदारण्यक उपनिषद् में अजातशत्रु को काशी अथवा विदेह का शासक कहा गया है। इसके अतिरिक्त शांखायन और बौधायन श्रोतसूत्र में भी काशी तथा विदेह का पास-पास उल्लेख हुआ है। स्वतंत्र राज्यसत्ता नष्ट हो जाने के पश्चात् काशी के कोशल राज्य में सम्मिलित हो जाने का भी उल्लेख मिलता है।
काशी को प्रायः ‘मंदिरों का शहर’, ‘भारत की धार्मिक राजधानी’, ‘भगवान शिव की नगरी’, ‘दीपों का शहर’, ‘ज्ञान नगरी’ आदि विशेषणों से संबोधित किया जाता है।
प्रसिद्ध अमरीकी लेखक मार्क ट्वेन लिखते हैं: “बनारस इतिहास से भी पुरातन है, परंपराओं से पुराना है, किंवदंतियों (लीजेन्ड्स) से भी प्राचीन है और जब इन सबको एकत्र कर दें, तो उस संग्रह से भी दोगुना प्राचीन है।”
मध्य युग में यह कन्नौज राज्य का अंग था और बाद में बंगाल के पाल नरेशों का इस पर अधिकार हो गया था। सन् 1194 में शहाबुद्दीन ग़ोरी ने इस नगर को लूटा और क्षति पहुँचायी। फिर कुतुब-उद-दीन ऐबक ने हजारों मंदिरों और धार्मिक स्मारकों को नष्ट कर दिया। मुग़ल काल में इसका नाम बदल कर मुहम्मदाबाद रखा गया। बाद में इसे अवध दरबार के प्रत्यक्ष नियंत्रण में रखा गया।
बलवंत सिंह ने बक्सर की लड़ाई में अंग्रेज़ों का साथ दिया और इसके उपलक्ष्य में वाराणसी को अवध दरबार से स्वतंत्र कराया। सन् 1911 में अंग्रेज़ों ने महाराज प्रभुनारायण सिंह को वाराणसी का राजा बना दिया। सन् 1950 में यह राज्य स्वेच्छा से भारतीय गणराज्य में शामिल हो गया।
वाराणसी विभिन्न मत-मतान्तरों की संगम स्थली रही है। विद्या के इस पुरातन और शाश्वत नगर ने सदियों से धार्मिक गुरुओं, सुधारकों और प्रचारकों को अपनी ओर आकृष्ट किया है। भगवान बुद्ध और शंकराचार्य के अलावा रामानुज, वल्लभाचार्य, कबीर, गुरु नानक, तुलसीदास, चैतन्य महाप्रभु, रैदास आदि अनेक संत इस नगरी में आये। काशी 3000 वर्षों से सीखने और सिखाने का एक बड़ा केंद्र रहा है। यह अध्यात्मवाद, रहस्यवाद, संस्कृत, योग और हिंदी भाषा के प्रचार से जुड़ा है। आज भी काशी में उपस्थित BHU, एशिया का सबसे बड़ा रेसीडेंटल यूनिवर्सिटी है।
काशी में स्थित दो विश्वनाथ मंदिर इसकी प्रसिद्धिता को और बढ़ा देते हैं। पहला विश्वनाथ मंदिर जो 12 ज्योतिर्लिंगों में नौवां स्थान रखता है, वहीं दूसरा जिसे नया विश्वनाथ मंदिर कहा जाता है. यह मंदिर काशी विश्वविद्यालय के प्रांगण में स्थित है।
काशी विश्वनाथ मंदिर के वरिष्ठ पुजारी अमरनाथ उपाध्याय बताते हैं, ‘काशीवास में चार तत्व शामिल हैं- यहां रहिए, विद्वानों के संगति में रहिए, गंगाजल का सेवन करिए और भगवान शिव की प्रार्थना करिए। जो इन चारों तत्वों का पालन करते हैं उन्हें भगवान विश्वनाथ के अवतार भगवान तारकेश्वर के आशीर्वाद से जन्म और मरण से मोक्ष मिल जाता है।
कहा जाता है कि आयुर्वेद की उत्पत्ति वाराणसी में हुई और इसे आधुनिक चिकित्सा विज्ञान जैसे प्लास्टिक सर्जरी, मोतियाबिंद और पथरी के ऑपरेशन का आधार है। आयुर्वेद और योग के पूर्वदाता महर्षि पतंजलि भी वाराणसी से संबद्ध थे।
काशी में गंगा स्नान का अलग ही महत्व है। काशी में गंगा नश्वर लोगों के शरीर ही नहीं बल्कि आत्मा तक को पवित्र कर देने की शक्ति रखती है। ‘काशी में मरे तो सीधा मोक्ष की प्राप्ति होगी’ ये बात विश्व प्रसिद्ध है ।क्योंकि काशी को भगवान शिव और पार्वती के निवास, माना जाता है इसलिए हिंदुओ का मानना है कि जो काशी की भूमि पर मरने के लिए अनुग्रहित है वह जन्म और पुन: जन्म के चक्र से मुक्ति और मोक्ष प्राप्त करेगा। इसी मोक्ष की प्राप्ति के लिए अघोरी साधु, जो शिव के रूप महाकाल की पूजा करते है, काशी को अपना गढ़ मानते हैं। अघोरियों के लिए सब कुछ भगवान शिव ही होते हैं।
मोक्ष की प्राप्ति के लिए ज़रूरी होती है मृत्यु । पर मृत्यु और मोक्ष के बीच एक जगह और आती है जिसे कहते है शमशान । पर काशी तो मोक्ष का केंद्र है इसलिए यहाँ शमशान नहीं बल्कि महाशमशान है जिसे सब मणिकर्णिका घाट के नाम से जानते हैं। भगवान शिव ने मणिकर्णिका घाट को अनंत शांति का वरदान दिया है। लोगों का यह भी मानना है कि यहां हजारों साल तक भगवान विष्णु ने भगवान शिव की आराधना की थी और ये प्रार्थना की थी कि सृष्टि के विनाश के समय भी काशी को नष्ट न किया जाए। प्रार्थना से प्रसन्न होकर भगवान शिव काशी आए और उन्होंने भगवान विष्णु की मनोकामना पूरी की। तभी से यह मान्यता है कि वाराणसी में अंतिम संस्कार करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है।
कुछ लोगों का कहना है कि भगवान शिव और पार्वती के स्नान केलिए यहां विष्णु जी ने कुआं खोदा था, जिसे लोग अब मणिकर्णिका कुंड कहते हैं। जब शिव इस कुंड में स्नान कर रहे थे, तब उनका एक कुंडल कुएं में गिर गया तब से इस जगह को मणिकर्णिका (मणि यानि कुंडल और कर्णम मतलब कान) घाट कहा जाने लगा।
काशी के लोगो कि माने तो काशी इतना पवित्र है कि यहाँ के प्रत्येक गली में भगवान शिव का अस्तित्व है।







