पूर्ण स्वाधीनता के लिए अनुशासन की आवश्यकता

जीतू मालवीय

आज के इस अति व्यस्त माहौल में अनुशासन व स्वाधीनता दोनों ही साथ में चलते हैं हम इसे समझें और जीवन में आगे बढ़े यही हमारा लक्ष्य होना चाहिए जीवन में आगे बढ़ने के लिए हमें कुछ नियमों का पालन करना पड़ता है
और यही संयम तुम्हें स्वाधीनता देता है ,यह हम पर निर्भर करता है कि हम अपना ध्यान स्वाधीनता पर आकर्षित करते हैं या अनुशासन पर और यही हमें सुखी या दुखी बनाता है ।
अनुशासन हीन स्वाधीनता सेना विहीन राष्ट्र के समान है

चारदीवारी को अपने स्थान पर ही रहने दो यदि सारी जमीन पर चारदीवारी बना दोगे तो घर कहां बनेगा इस समाज में रहते हुए पूर्ण स्वाधीनता की अवस्था की परिकल्पना कठिन है, इसलिए हमें व्यवहारिक होना है ,हां एक परम आनंद की अवस्था है जिसका वर्णन करना संभव नहीं है लेकिन ज्ञान का बड़ा दुरुपयोग हुआ है लोगों ने अपनी सुविधा और गलत धारणाओं के आधार पर अपनी व्यवस्था की व्याख्या की है मन में जागरूकता यह सजगता हृदय में प्रेम और कर्म में पवित्रता होनी चाहिए प्रेम और वह दो संभावना है जो तुम्हें सही मार्ग पर लाती

है जीवन उन्नति के लिए यहूदी धर्मावाली या धर्म धर्म को विशेष स्थान देता है किसी भी शिशु के जीवन में एक विशेष समय पर प्रकृति भय की भावना को जगाती है जब बच्चा बिल्कुल छोटा होता है उसे मां का पूर्ण समय और प्यार मिलता है तब शिशु के मन में भय नहीं होगा जैसे जैसे बच्चा बड़ा होता है और आत्मनिर्भर होता है तब सावधान हो जाता है प्रकृति उस समय उसके मन में डर भय की भावना जगा देती है आजादी के साथ बच्चा अपने कदम सावधानी से बढ़ाता है स्वाधीनता खोने का

भय प्रतिरक्षा या आत्मरक्षा को जन्म देता है प्रतिरक्षा का उद्देश्य भय को दूर करना इस पद पर ज्ञान की स्वाधीनता है।
और तुम्हें सुरक्षा की ओर ले जाता है तुम्हारा ज्ञान ही तुम्हारी स्वाधीनता निर्भर करता है और ज्ञान ही तुम्हारी रक्षा भी करता है इसीलिए अनुशासन के साथ अपने ज्ञान का पूर्ण उपयोग करते हुए अपनी स्वाधीनता से संयम पूर्वक अनुशासन से जीवन जीना ही एक ज्ञानी मनुष्य की प्रवृत्ति होती है।