*चॉकलेट से शुरू हुआ विवाद और वैवाहिक रिश्ते में विश्वासघात: क्या समाज में बढ़ रही है प्रतिशोध की मानसिकता?*
*छोटी-सी नाराजगी से लेकर हत्या की साजिश तक, बदलते मानवीय व्यवहार को समझने की जरूरत*
*मनोवैज्ञानिक एवं मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ | लेखक | पुनर्वास परामर्शदाता*
किसी समाज की स्थिति को केवल उसकी आर्थिक प्रगति, शिक्षा और आधुनिक तकनीक से नहीं समझा जा सकता। समाज को समझने के लिए यह देखना भी जरूरी है कि उसके लोगों का व्यवहार, भावनात्मक परिपक्वता, आपसी संबंध और नैतिक निर्णय लेने की क्षमता किस दिशा में विकसित हो रही है।
हाल के वर्षों में सामने आई कुछ आपराधिक घटनाएँ इस विषय पर गंभीर चिंतन की आवश्यकता पैदा करती हैं। मध्य प्रदेश के मंदसौर जिले के शामगढ़ में 12 वर्षीय बच्ची पर चार वर्षीय बच्चे की हत्या का आरोप और हरियाणा के पानीपत का विनोद भारारा हत्याकांड, जिसमें पत्नी और उसके कथित प्रेमी पर पति की हत्या की साजिश रचने के आरोप सामने आए थे, दो अलग-अलग परिस्थितियाँ हैं। लेकिन दोनों घटनाएँ मानव व्यवहार के कुछ महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक पहलुओं को समझने का अवसर देती हैं।
इन घटनाओं को केवल सनसनीखेज अपराध मानकर भूल जाना पर्याप्त नहीं होगा। हमें यह समझना होगा कि व्यक्ति के भीतर आक्रामकता, प्रतिशोध, भावनात्मक निर्भरता और नैतिक सीमाओं की उपेक्षा जैसी प्रवृत्तियाँ किन परिस्थितियों में विकसित होती हैं।
1. जब छोटी-सी नाराजगी प्रतिशोध का रूप ले लेती है
मंदसौर की घटना ने विशेष रूप से बाल मनोविज्ञान को लेकर सवाल खड़े किए हैं। पुलिस के अनुसार, चॉकलेट को लेकर हुए विवाद में बच्चे की मां ने पड़ोस में रहने वाली 12 वर्षीय बच्ची को डांटा था। आरोप है कि इसी नाराजगी के कारण बच्ची ने चार वर्षीय कृष्णपाल उर्फ बाबू को निशाना बनाया।
यहाँ सबसे महत्वपूर्ण सवाल है कि एक बच्ची के मन में उत्पन्न नाराजगी इतनी गंभीर हिंसक घटना तक कैसे पहुँच सकती है?
मनोविज्ञान में इसे समझने के लिए *Revenge Motivation* अर्थात प्रतिशोध की प्रेरणा की अवधारणा उपयोगी है।
जब किसी व्यक्ति को लगता है कि उसके साथ अपमानजनक व्यवहार हुआ है, तो वह उस अनुभव को अपने मन में बार-बार दोहरा सकता है। कुछ परिस्थितियों में यह नाराजगी धीरे-धीरे बदले की इच्छा में बदल सकती है।
लेकिन यह समझना जरूरी है कि नाराज होना और हिंसक अपराध करना दो अलग-अलग बातें हैं। अधिकांश बच्चे डांट या असहमति का सामना करते हैं, लेकिन वे हिंसा का रास्ता नहीं चुनते।
इसलिए इस बच्ची के मामले में केवल डांट को कारण मान लेना पर्याप्त नहीं होगा। उसके पहले के व्यवहार, पारिवारिक वातावरण, भावनात्मक विकास, सामाजिक अनुभव और मानसिक स्थिति की विस्तृत जाँच आवश्यक है।
2. क्या बच्चों में भावनात्मक नियंत्रण कमजोर हो रहा है?
12 वर्ष की उम्र बाल्यावस्था से किशोरावस्था की ओर बढ़ने का महत्वपूर्ण चरण है। इस दौरान मस्तिष्क का विकास जारी रहता है। निर्णय लेने, आवेगों पर नियंत्रण रखने, भविष्य के परिणामों का आकलन करने और भावनाओं को व्यवस्थित करने वाली क्षमताएँ भी विकसित हो रही होती हैं।
मनोविज्ञान में इसे Emotional Regulation और Impulse Control के संदर्भ में समझा जाता है।
हालाँकि, मंदसौर की घटना के उपलब्ध पुलिस विवरण में उद्देश्यपूर्ण व्यवहार के संकेत भी बताए गए हैं। इसलिए इसे केवल गुस्से में हुई तत्काल प्रतिक्रिया मान लेना उचित नहीं होगा।
यहाँ Instrumental Aggression यानी किसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए आक्रामक व्यवहार की अवधारणा की भी जाँच की जा सकती है।
प्रश्न यह है कि क्या बच्ची ने किसी नकारात्मक अनुभव को अपने मन में प्रतिशोध के रूप में विकसित किया और क्या उसके व्यवहार में पहले भी ऐसे संकेत मौजूद थे?
इसका उत्तर केवल विस्तृत बाल-मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन से ही मिल सकता है।
3. पानीपत हत्याकांड: जब वैवाहिक संबंध में विश्वास की जगह स्वार्थ ले लेता है
मानवीय व्यवहार का दूसरा गंभीर पहलू पानीपत के विनोद भारारा हत्याकांड में देखने को मिलता है।
दिसंबर 2021 में विनोद भारारा की हत्या हुई थी। जून 2024 में पुलिस की दोबारा जाँच के दौरान उनकी पत्नी निधि और जिम ट्रेनर सुमित की कथित भूमिका सामने आई। पुलिस के अनुसार, दोनों के बीच संबंध थे और पति को इसकी जानकारी होने के बाद वैवाहिक विवाद बढ़े। जाँच में दोनों पर हत्या की साजिश में शामिल होने के आरोप सामने आए।
यह घटना हमें एक महत्वपूर्ण प्रश्न पर विचार करने के लिए प्रेरित करती है—क्या किसी रिश्ते में भावनात्मक असंतोष या किसी तीसरे व्यक्ति के प्रति आकर्षण इतना प्रभावी हो सकता है कि व्यक्ति अपने नैतिक और सामाजिक दायित्वों की सीमाओं को भी पार कर जाए?
मनोविज्ञान में इस तरह के व्यवहार को समझने के लिए कुछ अवधारणाएँ महत्वपूर्ण हैं।
*पहली, Emotional Dependency:* किसी व्यक्ति के प्रति अत्यधिक भावनात्मक निर्भरता, जिसमें व्यक्ति अपने निर्णयों और प्राथमिकताओं को उस संबंध के प्रभाव में रखने लगता है।
*दूसरी, Cognitive Narrowing:* किसी एक इच्छा, लक्ष्य या संबंध पर अत्यधिक केंद्रित हो जाना, जिसके कारण व्यक्ति अन्य विकल्पों और संभावित परिणामों पर पर्याप्त विचार नहीं करता।
*तीसरी, Moral Disengagement:* अपने गलत व्यवहार को मानसिक रूप से उचित ठहराने की प्रक्रिया। इसमें व्यक्ति अपने कार्य की नैतिक जिम्मेदारी को कम करके देख सकता है या अपने व्यवहार के लिए परिस्थितियों को जिम्मेदार ठहरा सकता है।
*चौथी, Instrumental Aggression:* जब हिंसक व्यवहार किसी निश्चित उद्देश्य को प्राप्त करने के साधन के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।
यह स्पष्ट करना जरूरी है कि प्रेम संबंध, वैवाहिक असंतोष या विवाहेतर संबंध अपने आप में हिंसा का कारण नहीं होते। किसी भी संबंध में असहमति या अलगाव का समाधान संवाद, कानूनी प्रक्रिया और शांतिपूर्ण निर्णयों से होना चाहिए। किसी व्यक्ति के जीवन के विरुद्ध हिंसा को किसी भी परिस्थिति में उचित नहीं ठहराया जा सकता।
4. क्या हर हिंसक व्यक्ति मानसिक बीमारी से ग्रस्त होता है?
यह समाज में प्रचलित एक बड़ी गलतफहमी है।
किसी व्यक्ति द्वारा गंभीर अपराध किए जाने का अर्थ यह नहीं है कि वह अनिवार्य रूप से किसी मानसिक बीमारी से ग्रस्त है।
मनोविज्ञान में Conduct Disorder, Callous-Unemotional Traits, Emotional Dysregulation और Antisocial Behaviour जैसी अलग-अलग अवधारणाएँ हैं।
लेकिन इनके बीच अंतर समझना आवश्यक है।
उदाहरण के लिए, Conduct Disorder का निदान किसी एक घटना के आधार पर नहीं किया जाता। इसके लिए निर्धारित नैदानिक मानदंडों के अनुसार व्यवहार के लगातार पैटर्न, इतिहास और व्यापक मूल्यांकन की आवश्यकता होती है।
इसी प्रकार किसी बच्चे को Psychopath कहना भी उचित नहीं है। बच्चों में इस प्रकार के लेबल लगाने से बचना चाहिए।
हर अपराधी को मानसिक रोगी कहना मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी गलत धारणाओं को बढ़ावा देता है। वहीं मानसिक बीमारी से जूझ रहे अधिकांश लोग हिंसक अपराध नहीं करते।
हमें अपराध की कानूनी जिम्मेदारी और मानसिक स्वास्थ्य के वैज्ञानिक मूल्यांकन को अलग-अलग समझना होगा।
5. बच्चों के व्यवहार को समझने में परिवार की भूमिका
बच्चे का व्यक्तित्व केवल स्कूल और किताबों से विकसित नहीं होता। उसका परिवार, आसपास का वातावरण, मित्र समूह, सामाजिक अनुभव और डिजिटल दुनिया भी उसके व्यवहार को प्रभावित करते हैं।
अभिभावकों को बच्चों के व्यवहार में आने वाले बदलावों पर ध्यान देना चाहिए।
क्या बच्चा छोटी-छोटी बातों पर अत्यधिक आक्रामक हो रहा है? क्या वह दूसरों की भावनाओं की उपेक्षा करता है? क्या उसमें बार-बार बदला लेने की भावना दिखाई देती है? क्या वह दूसरों को नुकसान पहुँचाने को सामान्य समझने लगा है?
ये प्रश्न किसी बच्चे को अपराधी घोषित करने के लिए नहीं, बल्कि समय रहते उसकी सहायता करने के लिए हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन भी बच्चों के प्रति हिंसा और उसके जोखिमों को व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामुदायिक तथा सामाजिक स्तरों पर समझने की आवश्यकता बताता है।
इसलिए बच्चों के लिए केवल अनुशासन पर्याप्त नहीं है। उन्हें भावनाओं को व्यक्त करना, असहमति स्वीकार करना, निराशा का सामना करना, दूसरों की पीड़ा समझना और समस्याओं का अहिंसक समाधान करना भी सिखाना होगा।
6. समाज को Emotional Intelligence की शिक्षा की आवश्यकता
हम बच्चों को गणित, विज्ञान, तकनीक और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराते हैं। लेकिन क्या हम उन्हें गुस्सा नियंत्रित करना, अस्वीकृति स्वीकार करना और असफलता से निपटना भी सिखाते हैं?
इसी प्रकार वयस्कों के लिए भी भावनात्मक परिपक्वता अत्यंत आवश्यक है।
रिश्तों में विवाद होना असामान्य नहीं है। वैवाहिक जीवन में मतभेद, विश्वास की समस्या, अलगाव और भावनात्मक असंतोष जैसी परिस्थितियाँ आ सकती हैं। लेकिन इन परिस्थितियों में लिए गए निर्णय व्यक्ति के जीवन और पूरे परिवार को प्रभावित करते हैं।
हमें बच्चों और वयस्कों दोनों में Emotional Intelligence, Empathy, Conflict Resolution और Responsible Decision Making को बढ़ावा देना होगा।
स्कूलों में मनोवैज्ञानिक परामर्श की बेहतर व्यवस्था, अभिभावकों के लिए जागरूकता कार्यक्रम, परिवार परामर्श केंद्र और जरूरत के अनुसार मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच बढ़ाना समय की आवश्यकता है।
7. अपराध के बाद नहीं, उससे पहले मनोवैज्ञानिक हस्तक्षेप जरूरी
मनोवैज्ञानिक सहायता का उद्देश्य केवल किसी मानसिक समस्या का उपचार करना नहीं है। इसका एक महत्वपूर्ण उद्देश्य व्यक्ति को अपनी भावनाओं, विचारों और व्यवहार को समझने में मदद करना भी है।
यदि किसी बच्चे में लगातार आक्रामकता, असामान्य क्रूरता या दूसरों को नुकसान पहुँचाने की प्रवृत्ति दिखाई देती है, तो समय रहते बाल-मनोवैज्ञानिक से मूल्यांकन करवाना चाहिए।
इसी तरह वैवाहिक जीवन में गंभीर तनाव, लगातार संघर्ष, भावनात्मक अस्थिरता या संबंधों में टूटन की स्थिति में परिवार परामर्श और व्यक्तिगत मनोवैज्ञानिक सहायता उपयोगी हो सकती है।
हालाँकि, यह भी समझना जरूरी है कि किसी भी एक परामर्श या हस्तक्षेप से भविष्य में अपराध न होने की गारंटी नहीं दी जा सकती। रोकथाम के लिए निरंतर प्रयास और उचित सामाजिक एवं कानूनी व्यवस्था आवश्यक है।
*निष्कर्ष*: सवाल केवल अपराध का नहीं, मानवीय व्यवहार का भी है
मंदसौर और पानीपत की घटनाएँ एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हैं। एक में बाल्यावस्था के व्यवहार और मानसिक विकास को समझने की आवश्यकता है, तो दूसरी में वयस्क संबंधों, नैतिक निर्णयों और कथित उद्देश्यपूर्ण हिंसा का प्रश्न है।
इन दोनों को एक ही मनोवैज्ञानिक बीमारी या कारण से जोड़ना वैज्ञानिक रूप से गलत होगा।
लेकिन दोनों घटनाओं से एक व्यापक सामाजिक संदेश जरूर निकलता है—भावनाओं का होना स्वाभाविक है, लेकिन उन भावनाओं के आधार पर लिए गए निर्णयों की जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
गुस्सा, नाराजगी, प्रेम, ईर्ष्या और असंतोष मानवीय भावनाएँ हैं। इन भावनाओं को समझना और नियंत्रित करना सीखना ही भावनात्मक परिपक्वता है।
*हमें ऐसा समाज बनाना होगा जहाँ बच्चों को केवल सफल होना नहीं, संवेदनशील होना भी सिखाया जाए; जहाँ रिश्तों में मतभेद होने पर हिंसा नहीं, संवाद का रास्ता चुना जाए और जहाँ मानसिक स्वास्थ्य को अपराध होने के बाद याद करने के बजाय जीवन का नियमित हिस्सा बनाया जाए।*
क्योंकि स्वस्थ समाज केवल कानून के डर से नहीं बनता, वह भावनात्मक रूप से परिपक्व, संवेदनशील और जिम्मेदार नागरिकों से बनता है।
*डॉ. संदीप गोहे*
मनोवैज्ञानिक एवं मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ। लेखक | पुनर्वास परामर्शदाता