मन — रोग भी, उपचार भी

 

डॉ. नवीन वागद्रे

आज की तेज़ रफ्तार जीवनशैली में एक विचित्र स्थिति सामने आ रही है—सब कुछ सामान्य दिखता है, फिर भी भीतर असामान्यता का अनुभव होता है। घर व्यवस्थित है, कार्य चल रहा है, सामाजिक संबंध बने हुए हैं, दिनचर्या भी लगभग संतुलित है; फिर भी मन में एक अनकहा बोझ, एक अस्पष्ट भारीपन और बिना कारण की थकान बनी रहती है। शरीर शारीरिक श्रम से नहीं थका होता, परंतु विश्राम के बाद भी ताजगी का अनुभव नहीं होता। यह विरोधाभास आधुनिक मनुष्य की सबसे बड़ी आंतरिक चुनौती बनता जा रहा है।

भारतीय दर्शन ने इस अनुभव को सदियों पूर्व पहचान लिया था। उपनिषद में मन को इंद्रियों का स्वामी बताया गया है, जो बाहरी अनुभवों को अर्थ देता है और आंतरिक जगत का निर्माण करता है। भगवद्गीता में स्पष्ट कहा गया है कि मनुष्य स्वयं अपना मित्र भी है और स्वयं अपना शत्रु भी। वहीं पतंजलि योगसूत्र में ‘चित्तवृत्ति निरोध’ को ही योग की परिभाषा माना गया है—अर्थात मन की अनियंत्रित वृत्तियों का संतुलन ही स्वास्थ्य और मुक्ति का मार्ग है।

आधुनिक विज्ञान भी अब इसी दिशा में संकेत कर रहा है। मन कोई ठोस वस्तु नहीं, बल्कि एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है, जिसमें मस्तिष्क, तंत्रिका तंत्र, हार्मोन और भावनाएँ परस्पर संवाद करती रहती हैं। जब व्यक्ति स्वयं को असुरक्षित या असंतुलित अनुभव करता है, तब शरीर तनाव की अवस्था में प्रवेश करता है—हृदयगति बढ़ती है, नींद प्रभावित होती है, पाचन तंत्र धीमा पड़ सकता है और दीर्घकाल में यह स्थिति विभिन्न मनोसामाजिक विकारों को जन्म दे सकती है। इसके विपरीत जब मन को सुरक्षा और स्वीकार्यता का संकेत मिलता है, तब शरीर की उपचार-प्रणालियाँ सक्रिय हो जाती हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, किसी भी घटना का प्रभाव केवल घटना पर निर्भर नहीं करता, बल्कि इस पर निर्भर करता है कि मन उसे किस प्रकार व्याख्यायित करता है। एक ही परिस्थिति किसी व्यक्ति को तोड़ सकती है, जबकि वही परिस्थिति दूसरे को मजबूत बना सकती है। अंतर बाहरी वास्तविकता में नहीं, बल्कि आंतरिक प्रतिक्रिया में होता है। उदाहरण के लिए, केवल नींबू की कल्पना करने मात्र से मुँह में पानी आ जाना यह दर्शाता है कि मन की कल्पना भी शरीर में वास्तविक जैविक प्रतिक्रिया उत्पन्न कर सकती है। इससे स्पष्ट होता है कि मन अदृश्य अवश्य है, पर उसका प्रभाव पूर्णतः वास्तविक है।

रात्रि में जब शरीर विश्राम चाहता है, तब भी मन की सक्रियता बनी रह सकती है। एक विचार के बाद दूसरा विचार, और फिर तीसरा—यह अनवरत प्रवाह व्यक्ति को मानसिक थकान की स्थिति में पहुँचा सकता है। यही कारण है कि आज अनिद्रा, चिंता और अवसाद जैसी समस्याएँ बढ़ती जा रही हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञ मानते हैं कि मन को समझना और उसकी गतिविधियों का अवलोकन करना उपचार की दिशा में पहला कदम है।

इस संदर्भ में मन से संघर्ष करने के बजाय उसे देखने और समझने की आवश्यकता है। जब व्यक्ति पहली बार यह अनुभव करता है कि विचार स्वयं उत्पन्न हो रहे हैं—बिना बुलाए, बिना प्रयास के—तभी एक आंतरिक दूरी बनती है। यही दूरी जागरूकता की शुरुआत है। और यही जागरूकता धीरे-धीरे उपचार का द्वार खोलती है।

समाज के लिए यह समझ अत्यंत महत्वपूर्ण है कि रोग केवल शरीर में उत्पन्न नहीं होते; कई बार उनकी जड़ें मन की सूक्ष्म परतों में होती हैं। यदि मन को संतुलित, सुरक्षित और जागरूक बनाया जाए, तो वही मन जो रोग का कारण बनता है, उपचार का माध्यम भी बन सकता है।