देशभर में मिलेट्स यानी मोटे अनाज को लेकर जागरूकता तेजी से बढ़ रही है। ज्वार, बाजरा, रागी, कंगनी, कोदो और सामा जैसे पारंपरिक अनाज एक बार फिर लोगों की थाली में अपनी जगह बना रहे हैं। बदलती जीवनशैली, बढ़ते डायबिटीज और मोटापे के मामलों के बीच लोग परिष्कृत आटे और पॉलिश्ड चावल के विकल्प तलाश रहे हैं, और ऐसे में मिलेट्स को एक बेहतर विकल्प के रूप में देखा जा रहा है। डॉ नवीन वागद्रे बताते हैं कि मिलेट्स का लाभ तभी मिलता है जब इन्हें सही मात्रा, सही मौसम और सही विधि से अपनाया जाए।
डॉ नवीन के अनुसार मिलेट्स पोषण से भरपूर होते हैं। इनमें पर्याप्त मात्रा में फाइबर, मध्यम स्तर का प्रोटीन, मैग्नीशियम, आयरन, जिंक और बी-कॉम्प्लेक्स विटामिन पाए जाते हैं। ये जटिल कार्बोहाइड्रेट का स्रोत हैं, जो शरीर को धीरे-धीरे ऊर्जा प्रदान करते हैं और अचानक ब्लड शुगर बढ़ने की संभावना को कम कर सकते हैं। इसी कारण इन्हें डायबिटीज, वजन प्रबंधन और हृदय स्वास्थ्य में सहायक आहार के रूप में शामिल किया जा रहा है। मात्रा को लेकर अक्सर भ्रम देखा जाता है। कुछ लोग मिलेट्स शुरू करते ही पूरी तरह गेहूँ और चावल छोड़ देते हैं, जो हर व्यक्ति के लिए उपयुक्त नहीं होता। सामान्य रूप से एक स्वस्थ, कम शारीरिक श्रम करने वाले व्यक्ति के लिए प्रतिदिन लगभग 50 से 100 ग्राम (कच्चे वजन के अनुसार) मिलेट पर्याप्त माने जा सकते हैं, लेकिन शुरुआत में 50 से 75 ग्राम प्रतिदिन अधिक सुरक्षित और व्यावहारिक मात्रा है। मिलेट्स में फाइबर अधिक होने के कारण इन्हें अचानक बड़ी मात्रा में लेने से गैस, पेट फूलना या भारीपन जैसी समस्याएँ हो सकती हैं। इसलिए बेहतर है कि इन्हें धीरे-धीरे आहार में शामिल किया जाए और शरीर को अनुकूल होने का समय दिया जाए।
यदि कोई व्यक्ति पहली बार मिलेट्स शुरू कर रहा है, तो सप्ताह में दो से तीन बार किसी एक भोजन, जैसे नाश्ते या दोपहर के भोजन में इन्हें शामिल करना उचित रहता है। धीरे-धीरे मात्रा और आवृत्ति बढ़ाई जा सकती है। यह क्रमिक परिवर्तन न केवल पाचन के लिए सुरक्षित है, बल्कि लंबे समय तक पालन करना भी आसान बनाता है। मौसम और शरीर प्रकृति के अनुसार मिलेट्स का चयन भी महत्वपूर्ण है। बाजरा पारंपरिक रूप से गर्म तासीर वाला माना जाता है और सर्दियों में अधिक उपयुक्त समझा जाता है, जबकि ज्वार अपेक्षाकृत हल्का माना जाता है और गर्मियों में लिया जा सकता है। रागी कैल्शियम से भरपूर होने के कारण बच्चों और बुजुर्गों के लिए उपयोगी हो सकती है। इसलिए अनाज का चयन करते समय व्यक्ति की पाचन क्षमता, शरीर की प्रकृति और स्थानीय जलवायु को ध्यान में रखना चाहिए।
मिलेट्स की सही तैयारी पर विशेष ध्यान देना आवश्यक है। इनमें प्राकृतिक रूप से फाइटेट्स और टैनिन्स जैसे तत्व पाए जाते हैं, जो आयरन और जिंक जैसे खनिजों के अवशोषण को कुछ हद तक कम कर सकते हैं। इस कारण इन्हें छह से आठ घंटे भिगोकर, अंकुरित करके या किण्वित रूप में लेना अधिक लाभकारी माना जाता है। इससे पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ती है और पाचन अधिक सहज होता है। साथ ही, उच्च फाइबर आहार के साथ पर्याप्त पानी का सेवन करना भी जरूरी है, अन्यथा कब्ज या पेट संबंधी असुविधा हो सकती है।
कुछ विशेष स्थितियों में सावधानी भी आवश्यक है। थायरॉइड रोगियों को अत्यधिक मात्रा में रोज़ाना सेवन से बचना चाहिए और संतुलित मात्रा में ही मिलेट्स लेना चाहिए। किडनी स्टोन की प्रवृत्ति वाले व्यक्तियों को ऑक्सलेट युक्त मिलेट्स सीमित मात्रा में लेने चाहिए। जिन लोगों को पाचन संबंधी संवेदनशीलता या इर्रिटेबल बॉवेल सिंड्रोम जैसी समस्या हो, वे धीरे-धीरे मात्रा बढ़ाएँ और शरीर की प्रतिक्रिया पर ध्यान दें।
संतुलित और उचित विधि से सेवन करने पर मिलेट्स रक्त शर्करा नियंत्रण में सहायक हो सकते हैं, वजन प्रबंधन में मदद कर सकते हैं, हृदय स्वास्थ्य को समर्थन दे सकते हैं और आंतों के माइक्रोबायोम को बेहतर बनाने में योगदान कर सकते हैं। फिर भी, विशेषज्ञों का मत है कि किसी भी एक अनाज को चमत्कारिक समाधान मानना उचित नहीं है। विविध और संतुलित आहार ही दीर्घकालिक स्वास्थ्य की आधारशिला है।
मिलेट्स का पुनरागमन केवल परंपरा की ओर लौटना नहीं है, बल्कि वैज्ञानिक समझ के साथ संतुलित आहार अपनाने की दिशा में एक सकारात्मक कदम है। यदि इन्हें मात्रा, मौसम और सही तैयारी के सिद्धांतों के साथ अपनाया जाए, तो ये आधुनिक जीवनशैली में स्वास्थ्य संरक्षण का एक प्रभावी साधन बन सकते हैं।







