5 हजार साल पुरानी महाभारत भाई-भाई की दरार आज भी अधिकांश घरों में है, शिक्षा वह नहीं की डिग्री हासिल करें संस्कार भी जरूरी है : आस्था दीदी
टेंशन ओवरथिंकिंग के कारण 21वीं सदी अवसाद की सदी बन गई है
घोड़ाडोंगरी। ब्रह्माकुमारी संस्था द्वारा नगर के दुर्गा चौक में आयोजित श्रीमद् भागवत ज्ञान गंगा यज्ञ के शुभारंभ अवसर पर ब्रह्माकुमारी भवन से भव्य कलश यात्रा निकाली गई। जिसमें बड़ी संख्या में महिलाएं शामिल हुई।
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कलश यात्रा का नगर के पूर्व विधायक निवास के सामने पार्षद श्रीमती नेहा दीपक उइके द्वारा पुष्प वर्षा पर स्वागत किया गया। भवानी चौक पर सोनारे परिवार साहू परिवार द्वारा स्वागत किया गया सराफा चौक में तजिंदर सिंह पप्पू पोपली परिवार द्वारा पुष्प वर्षा कर स्वागत किया गया। देखे वीडियो
कलश यात्रा का जगह-जगह भव्य स्वागत हुआ दुर्गा चौक में श्रीमद् भागवत के प्रथम दिवस आस्था दीदी ने अपने प्रवचन में कहा कि ज्ञान को पाने के लिए अपने आप को समर्पित करना जरूरी है ।कर्म ही मनुष्य की विजय है आज के परिवेश में गीता का ज्ञान क्यों आवश्यक है इस पर बताते हुए कहा कि आज विज्ञान ने बहुत प्रगति कर ली है इतनी सारी सुविधाओं के बावजूद पहले से ज्यादा दुख अशांति है। बच्चों तक अशांति, मानसिक रोग से जूझ रहे हैं आज की बढ़ती समस्या चिंता डिप्रेशन है आंतरिक सुख सदा के लिए पाना चाहते हैं तो परमात्मा की शरण लेनी होगी ।वस्तुओं और सामान बाहरी सुख दिला सकते हैं पर आंतरिक नहीं।
आज हमारा देश पश्चिमी सभ्यता का गुलाम होते जा रहा है मानवीय मूल्यों को खोते जा रहे हैं। शिक्षा वह नहीं है की डिग्री हासिल करें संस्कार भी जरूरी है। जब दो भाइयों के बीच आपसी दरार बढ़ जाती है ऐसा 95% तक देखा जा रहा है। 5000 साल पुरानी महाभारत भाई-भाई में दरार की कहानी की स्थिति अधिकांश घरों में है ।श्री राम के समय भाई-भाई एक दूसरे के लिए गद्दी छोड़ रहे थे लेकिन आज स्थिति विपरीत है कोर्ट कचहरी हॉस्पिटल झगड़ा देखे जा रहे हैं।
ऐसी स्थिति में आचरण कैसा होना चाहिए आज तक आप लोगों ने कई कथाएं सुनी होगी पर मन स्थिर होगा तो हमें पता होगा कि कहां परिवर्तन लाने की आवश्यकता है यह परिवर्तन का समय चल रहा है हमारे चित में दिव्य गुणो का समावेश नहीं होगा तब तब तक परिवर्तन नहीं आएगा। मुट्ठी भर लोगों से ही परिवर्तन आता है।
आप धर्म के साथ हैं तो जीत अवश्य होगी धर्म मतलब हमारा धर्म शांति है परोपकार करना हमारा धर्म है हमारी संस्कृति देना सिखाती है दूसरों के हक छीनकर शांति से नहीं रह सकते आज सब कुछ है गाड़ी बंगला फिर भी लगता है कम है पेट भरने के लिए चार रोटी काफी हैं पर पेटिया नही भरी जा सकती। आईना की तरह महाभारत एक दर्पण है जिसमें हमें देखना है कि हम कौन सी लिस्ट में हैं उन्होंने पूछा कि कितनों को लगता है कि हम पांडव की कैटेगरी में हैं। जब एक पिता पुत्र मोह में पड़ जाए तो पुत्र भी दुर्योधन बन जाता है।आज जो अराजकता थोड़ी-थोड़ी चीजों में मांर पीट और लड़ाई झगड़ा हो रहे हैं इनको रोकने के लिए अपने मन में श्रेष्ठ विचारों को धारण करना होगा छोटी-छोटी बातों पर मेरे और तेरे पर आ जाते हैं छीना छपटी की सोच आ जाती है तो समझ लो कौरव बैठ गया है।
परमात्मा ने बुद्धि दी है सही गलत का ज्ञान हो पता होते हुए भी गड़बड़ी करते हैं तो परिणाम भुगतना पड़ता है समाज में घट रही घटनाएं कह रही है कि महाभारत काल आ गया है अपनी सुरक्षा आप स्वयं करें और चेतना प्रखर नहीं होगी तब तक महिलाएं फैशन को छोड़कर अध्यात्म से नहीं जुड़ेगी स्वयं की रक्षा कैसे करेगी।
जीवन की राह है जीतना चाहते हो तो प्रभु को साथी बना लो वह सारथी बन जाएंगे तैरने वाले भी डूब जाते हैं और जो डूबते हैं वह भी तेर जाते हैं परमात्मा मेहरबान रहता है। घर के स्वामी के जाने पर घर की शुद्ध करते हैं और प्रेत आत्मा से पिंड छुड़ाने पिंडदान करते हैं आपकी वैल्यू तब तक है सभी के को बराबर समझना होगा धर्म का वरण करेंगे तो अधर्म का रावण मारा जाएगा लक्ष्मण जी को शक्ति लगी थी वैसे ही आज मन को विकारों की शक्ति लगी है ज्ञान की संजीवनी से विकारों को दूर किया जा सकता है । पागल भी कभी नहीं कहता कि वह पागल है वैसे ही सबको बीमारी लगी है उन्होंने पूछा कि गुस्सा आता है कि नहीं । टेंशन ओवरथिंकिंग के कारण 21वीं सदी अवसाद की सदी बन गई है बुजुर्ग तो ठीक-ठाक है युवाओं पर ज्यादा असर है। अब कानों को अच्छी बातें अच्छी नहीं लगती किसके यहां क्या चल रहा है इस पर ज्यादा ध्यान है । कर्म अच्छे होंगे तो रामायण गीता पढ़नी नहीं पड़ेगी जीवन में आ जाएगी।
पुत्र मोह में सब दिला देते हैं पर संस्कार नहीं दिला पाए आप जिनके संपर्क में रहते हैं उनका प्रभाव पड़ता ही पड़ता है जिसका जीवन अच्छा बीतेगा तो अंत भी अच्छा होगा ब्लड प्रेशर शरीर की प्रॉब्लम नहीं है मन की प्रॉब्लम है संतानों को अच्छा बनाने का कार्य मां का होता है कथा याद है पर उसके पीछे का भाव नहीं पता कैसे जिया जाए यह हमें श्रीमद् भागवत गीता बताती है।










