गुरुद्वारे में दिखाई गई चार साहबजादे नम हुई सबकी आंखें

घोड़ाडोंगरी

नगर के स्थानीय गुरुद्वारा में गुरु सिंह सभा घोड़ाडोंगरी द्वारा चार साहबजादे फिल्म बड़े पर्दे पर दिखाई गई इस फिल्म को देखने के लिए बड़ी संख्या में नगर वासी मौजूद थे धर्म की रक्षा के लिए गुरु गोविंद सिंह के चार पुत्रों के बलिदान को फिल्म के माध्यम से जानकर हर शख्स की आंखें नम हो गई गुरु सिंह सभा द्वारा लोगों को इस बलिदान के बारे में जानकारी देने के लिए यह आयोजन किया गया था जिसमें बड़ी संख्या में बच्चे भी मौजूद थे जिन्होंने जाना की कैसे हमारे धर्म की रक्षा के लिए जो शहादत दी गई है उसके दम पर ही आज हमारा धर्म जिंदा है गुरुवार को गुरुद्वारे में वीर बाल दिवस भी मनाया गया क्षेत्रीय विधायक श्रीमती गंगा सज्जन सिंह उईके सहित बड़ी संख्या में नगर वासी वीर बाल दिवस पर भी मौजूद रहे। फिल्म के समापन के बाद सभी वीर शहीदों को श्रद्धांजलि दी गई।

सिखों के दसवें गुरु गुरु गोविंद सिंह नौवें गुरु श्री तेगबहादुर के पुत्र थे. मुगलों के शासनकाल में साल 1675 में कश्मीरी पंडितों की फरियाद पर श्री गुरु तेगबहादुर जी ने दिल्ली में अपना सर्वोच्च बलिदान दे दिया था. इसके बाद श्री गुरु गोविंद सिंह जी 11 नवंबर 1675 को दसवें गुरु के रूप में गुरु गद्दी पर आसीन हुए थे. उन्होंने धर्म और समाज की रक्षा के लिए साल 1699 ई. में खालसा पंथ की स्थापना की थी. पांच प्यारों को गुरु का दर्जा देकर स्वयं उनके शिष्य बन गए थे.  उनके बड़े साहिबजादे बाबा अजीत सिंह और बाबा जुझार सिंह ने चमकौर के युद्ध में शहादत हासिल की थी.

यह साल 1705 की बात है. मुगलों ने गुरु गोविंद सिंह जी से बदला लेने के लिए सरसा नदी के किनारे हमला किया तो गुरु का परिवार उनसे बिछड़ गया था. गुरु से बिछड़ने के बाद माता गुजरी अपने रसोइए गंगू के साथ छोटे साहिबजादों बाबा जोरावर सिंह और बाबा फतेह सिंह को लेकर उसके घर मोरिंडा चली गई थीं. गंगू ने अपने घर में माता गुजरी के पास मुहरें देखीं तो उसके मन में लालच आ गया. उसने माता गुजरी और दोनों साहिबजादों को सरहिंद के नवाब वजीर खान के सिपाहियों के हाथों पकड़वा दिया था.

सिर्फ इतनी थी साहिबजादों की आयु
तब साहिबजादों बाबा जोरावर सिंह और बाबा फतेह सिंह की उम्र सात और पांच साल ही थी. सरहिंद के नवाज वजीर खान ने दोनों साहिबजादों बाबा जोरावर सिंह और बाबा फतेह सिंह को खुले आसमान के नीचे कैद कर दिया था. माता गुजरी भी साथ थीं. पूस की सर्द रात में चारों ओर से खुले ऊंचे बुर्ज पर भी माता गुजरी जी अपने दोनों छोटे साहिबजादों को धर्म की रक्षा के लिए सिर न झुकाने और धर्म न बदलने का ही पाठ पढ़ाती रहीं. यही सीख देकर माता गुजरी जी नन्हे साहिबजादों को वजीर खान की कचहरी में भेजती थीं.

वजीर खान ने कचहरी में दोनों साहिबजादों से धर्म बदलने के लिए कहा पर उन्होंने जो बोले सो निहाल सत श्री अकाल के जयकारे लगा कर धर्म बदलने से मना कर दिया था. इस पर वजीर खान ने दोनों को धमकी दी थी कि कल तक धर्म बदल लो या फिर मरने के लिए तैयार रहो.

वजीर खान ने दीवार में जिंदा चुनवा दिया था
अगले दिन दोनों साहिबजादों को तैयार करके फिर वजीर खान की कचहरी में भेजा गया. वहां पर एक बार फिर से वजीर खान ने दोनों से धर्म बदलने के लिए कहा, लेकिन छोटे साहिबजादों ने इनकार कर दिया और एक बार फिर से जयकारे लगाने लगे. यह सुन कर वजीर खान गुस्से में आ गया और दोनों साहिबजादों को जिंदा दीवार में चुनवाने का आदेश दे दिया. तारीख थी 26 दिसंबर 1705. इन महान सपूतों को दीवार में जिंदा चुनवा दिया गया था.