एक गांव में एक परिवार रहता था। उनका एक छोटा सा बेटा था। एक दिन उस बच्चे ने अपने मुंह में बड़ा सा पत्थर डाल लिया। सभी घरवाले घबरा गए और सबने बच्चे को समझाया- बेटा! पत्थर मुंह में नहीं डालते, मुंह में से पत्थर बाहर निकाल दो। पर बच्चे ने किसी की भी बात नहीं सुनी और पत्थर मुंह से नहीं निकाला।
वे सभी उस बच्चे को लेकर डॉक्टर के पास गए तो वो डाॅक्टर भी किसी दूसरे गांव में गया हुआ था। सभी बहुत परेशान हो गए, कि अब क्या करें?
एक पड़ोसी बोला- गांव में एक महात्मा जी आए हैं, बच्चे को उनके पास ले चलो।
घरवाले उस बच्चे को महात्मा जी के पास ले गए।
महात्मा जी ने एक मिनट में ही बच्चे के मुंह से पत्थर बाहर निकाल दिया। सभी बहुत हैरान और खुश भी हुए। सभी ने पूछा- महात्मा जी, आपने बच्चे को कैसे मनाया?
महात्मा जी ने फरमाया- बच्चे के मुंह में पत्थर था, मैंने उसे मीठी मिठाई दे दी तो बच्चे ने पत्थर बाहर निकाल कर फैंक दिया।
ये जो पांच विकार हैं – काम, क्रोध, लोभ, मोह और अंहकार ये हैं पत्थर और ये जो मिठाई है, ये है भजन-सिमरन की मिठास।
ओह रस आवा, ऐह रस नहीं भावा
लेकिन हम अपने सत्गुरु द्वारा बख्शी गयी नाम/दीक्षा की मिठाई का स्वाद कब चखेंगे? कितना समय हमने फिजूल ही गंवा दिया।
क्या हम पूरी जिंदगी इन विषय और विकारों की मोह-ममता के पत्थर ही चूसते रहेंगे या अपने अंदर बरस रहे नाम के अमृत को पीने की कोशिश भी करेंगे।
चार गंवाया हंड के
चार गंवाया सम्म
लेखा रब्ब मंगेसिआ
तूं आहों केहड़े कम्म
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आप सभी का दिन शुभ हो 🙏🏻😊







