1200 से अधिक धार्मिक श्रद्धालुओं की पंचकोशी यात्रा किसी महोत्सव से काम नहीं रहत
पीपरी। आगामी 3 अक्टूबर से 7 अक्टूबर तक 115 किलोमीटर की पदयात्रा क्षेत्र में किसी महोत्सव से कम नहीं रहती है। उक्त यात्रा के जहां पर भी पड़ाव रहते हैं उस स्थान पर स्थानीय नागरिक श्रद्धालु की पूरी व्यवस्था करते हैं। इस वर्ष इस यात्रा का लगातार 37 वा वर्ष रहेगा कोरोना काल में भी यह यात्रा बंद नहीं हुई थी। रास्ते में आने वाले सीता मंदिर निमनपुर रतनपुर गांव में सीरवी समाज के लोग बढ़ चढ़कर इन श्रद्धालुओं का स्वागत करते हैं और जरूरत की खाने-पीने की वस्तुओं से सत्कार करते है। इस महत्वपूर्ण सहयोग में भूरा भाई अचाले एवं इंदर भाई सेन खाने पीने की चीजों की व्यवस्था करते हैं। अन्य श्रद्धालु संजय मुकाती रास्ते भर अलग-अलग प्रकार से समस्त श्रद्धालुओं का सहयोग करते नजर आते हैं। और विपरीत परिस्थिति में खारी नदी को पार करने के लिए जरूरी संसाधन की व्यवस्था जुटाते हैं। सनातन सेवा समिति बोल बम कावड़ यात्रा से जुड़े गिरधर गुप्ता ने बताया कि वह स्वयं 30 वर्षों से पंचकोशी यात्रा की अगवानी कर रहे हैं। प्रतिवर्ष लगातार श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ती जा रही है , इन श्रद्धालुओं में महिलाओं और बच्चों की संख्या भी शामिल रहती है, इस वर्ष जयंती माता स्थित खारी नदी पर वन विभाग द्वारा लकड़ी पुल अभी तक नहीं बनाया जो चिंता का विषय है। बागली विधायक मुरली भंवरा ने इस संबंध में बताया कि उनकी चर्चा वन विभाग के अधिकारियों से हो गई है। 3 अक्टूबर यात्रा के पहले लकड़ी पुल का निर्माण हो जाएगा। भारतीय जनता पार्टी के मंडल अध्यक्ष अजय शर्मा ने भी इस मामले को उठाते हुए वन विभाग अधिकारियों से चर्चा की है।
धार्मिक रूप से निकलने वाली यह यात्रा देवास जिले और खंडवा जिले को जोड़ते हुए निकलती है । इस यात्रा में तीन पड़ाव खंडवा जिले में और दो पड़ाव देवास जिले में रहते हैं यात्रा का 40% हिस्सा खंडवा जिले से होकर गुजरता है। इस यात्रा में रोमांचं और खतरा यह रहता है, कि यात्रा के दौरान दो बार बड़ी नदियों को पार करना रहता है। पहले पड़ाव में जयंती माता स्थित जटाशंकर बागली से निकलने वाली खारी नदी रहती है। जिसमें लकड़ी पुल की सहायता से जो वन विभाग द्वारा प्रतिवर्ष बनाया जाता है उससे उस पर जाना रहता है। आगे का 50 किलोमीटर का पड़ाव फिर पैदल यात्रा करते हुए धाराजी के दक्षिणी छोर पर पहुंचता है। दक्षिणी छोर से नाव के द्वारा उत्तर के छोर पर आया जाता है, यहां पर बगैर नाव के सफर करना संभव नहीं है। 2004 के पूर्व भी बांध नहीं बनने की स्थिति में नाव का सफर ही होता था। पीपरी रतनपुर एवं निमनपुर वासियो में इस यात्रा को लेकर काफी उत्साह दिखाई दे रहा है ,यात्रा की तैयारी में प्रत्येक घर से कुछ नहीं कुछ सहयोग देकर श्रद्धालुओं का स्वागत सत्कार करने में यहां का व्यक्ति अपने आप को धन्य समझता है। पीपरी स्थित मंदिर में सभी श्रद्धालुओं को चाय नाश्ते के साथ भोजन भी करवाया जाता है। रास्ते में जहां-जहां से यात्रा गुजरती है वहां के नागरिक सभी श्रद्धालुओं का सत्कार करते हैं। पुराने श्रद्धालु बताते हैं कि यात्रा का उद्देश्य धार्मिक होकर एक दूसरे से मिलने जुलने का रहता है कारण यह कि जब यात्रा आरंभ हुई थी तब अधिकतर परिवारों के पास पैदल यात्रा के अलावा कोई साधन नहीं थे सभी लोग एक दूसरे के यहां सुख-दुख में पैदल ही भ्रमण करते थे इसीलिए इस यात्रा की योजना को साकार रूप दिया गया
कि परिजनों से मिलने जुलने के साथ ईस्ट मित्रों से मिलना जुलना भी हो जाता है। यात्रा में 40 प्रतिशत से अधिक श्रद्धालुओं की संख्या गुजर समाज की रहती है जिनकी रिश्तेदारी रास्ते में आने वाले सभी गांव में एक दूसरे से जुड़ी हुई है। हालांकि इस वर्ष यात्रा के पूर्व की सूचना उदयनगर थाने पर और पुनासा थाने पर दे दी गई है ,और अनुरोध किया गया है की धाराजी में यात्रा के दौरान पुलिस बल की व्यवस्था रखी जाए।







