भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि के दिन राधा जी का जन्मोत्सव मनाया जाता है। इस दिन को राधाष्टमी के नाम से जाना जाता है। राधा जी के पूजन के बिना कृष्ण पूजा अपूर्ण मानी जाती है। मान्यता है कि कृष्ण जन्माष्टमी के व्रत और पूजन का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए राधाष्टमी के दिन व्रत जरूर करना चाहिए। राधा जी स्वयं लक्ष्मी स्वरूपा हैं, राधाष्टमी के दिन व्रत और पूजन करन से भक्तों के सभी कष्ट और संकट दूर होते हैं। इस साल राधाष्टमी का व्रत 14 सितंबर, दिन मंगलवार को रखा जाएगा। आइए जानते हैं राधाष्टमी पर व्रत और पूजन का विधान….

राधाष्टमी का व्रत और पूजन विधि

राधाष्टमी के दिन प्रातः काल उठ कर स्नान आदि से निवृत्त हो कर एक मंडल या मंड़प का निर्माण करें। इस मंड़प के बीच में एक मिट्टी या तांबे के कलश पर एक पात्र रखें। पात्र में राधा जी की या राधा कृष्ण की संयुक्त मूर्ति स्थापित करें। सबसे पहले राधा जी को धूप,दीप, नैवेद्य अर्पित करें। इसेक बाद उनका षोडसोपचार विधि से पूजन करना चाहिए। राधा जी को नये वस्त्र आदि अर्पित कर, व्रत का संकल्प लें। राधाष्टमी के दिन फलाहार का व्रत रखना चाहिए। कुछ लोग रात्रि को राधा जी को भोग लगाने के बाद अन्न ग्रहण कर लेते हैं। जबकि कुछ लोग नवमी की तिथि पर अगले दिन स्नान दान के बाद व्रत का पारण करते हैं।राधाष्टमी का व्रत अखंड़ सौभाग्य और जीवन के सभी दुख दूर करने के लिए रखा जाता है। इस दिन विधि पूर्वक पूजन करने से कृष्ण जी के पूजन का पूर्ण फल मिलता है और मां लक्ष्मी का भी आशीर्वाद प्राप्त होता है। राधाष्टमी के पूजन के लिए तांबे के कलश और पात्र के अलावा धूप,दीप, रोली,अक्षत, नैवेद्य और वस्त्र चाहिए। इसके अलावा इस दिन राधा जी को श्रृगांर का सामान अर्पित करने से अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है।

. मंगलवार दिनांक 14.09.2021 तदनुसार संवत् २०७८ के भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि की है ‘राधाष्टमी’। वृषभानुनन्दिनी–कीर्तिकुमारी का जिस दिन व्रजमण्डल में हुआ था अवतरण:-

*”श्रीराधाजी का जन्म”*

भाद्रपदमास की कृष्णपक्ष की अष्टमी ‘श्रीकृष्णजन्माष्टमी’ और भाद्रपदमास की शुक्लपक्ष की अष्टमी ’श्रीराधाष्टमी’ के नाम से जानी जाती है।
श्रीराधा का ननिहाल रावलग्राम में था। रक्षाबंधन के पर्व पर श्रीराधा की गर्भवती मां कीर्तिरानी अपने भाई को राखी बांधने आईं। राधाष्टमी के एक दिन पहले बरसाने के राजा वृषभानुजी अपनी पत्नी को लिवाने आए। प्रात: यमुनास्नान करते समय भगवान की लीला से कीर्तिरानी के गर्भ का तेज निकलकर यमुना किनारे बढ़ने लगा और यमुनाजी के जल में नवविकसित कमल के केसर के मध्य एक परम सुन्दरी बालिका में परिणत हो गया। वृषभानुजी उस बालिका को अपने साथ ले आए और अपनी पत्नी को लेकर बरसाना आ गए।
बरसाने में खबर फैल गई कि कीर्तिदा ने एक सुन्दर बालिका को जन्म दिया है। वृषभानुभवन में वेदपाठ आरम्भ हो गया, राजद्वार पर मंगल-कलश सजाए गए। शहनाई, नौबत, भेरी, नगाड़े बजने लगे।
श्रीराधा के जन्म का समाचार सुनकर व्रजवासी, जामा, पीताम्बरी, पटका पहनकर सिरपर दूध, दही और माखन से भरी मटकियाँ लेकर गाते-बजाते वृषभानुभवन पहुँच गए और राजा वृषभानु को बधाइयाँ देने लगे। तान भर-भर कर सोहिले गायी जाने लगीं। राजा वृषभानु के ऊंचे पर्वत पर बने महल के जगमोहन में श्रीराधा के पालने के दर्शन हो रहे थे। आँगन में बैठे गोप और बारहद्वारी में बैठी महिलाएँ सुरीले गीत गा रहीं थीं।
राजा वृषभानु ने श्रीराधा के झूलने के लिए चंदन की लकड़ी का पालना बनवाया जिसमें सोने-चांदी के पत्र और जवाहरात लगे थे। पालने में श्रीजी के झूलने के स्थान को नीलमणि से बने मोरों की बेलों से सजाया गया था।
नवजात बालिका श्रीराधा का जन्म मूल नक्षत्र में हुआ अत: मूलशान्ति के लिए दिव्य औषधियों, वन की औषधियों, सर्वोषधि आदि से स्नान कराकर गाय के दूध, दही, घी, इत्र व सुगन्धित जल से अभिषेक किया गया और फिर सुन्दर श्रृंगार धारण कराकर दुग्धपान कराया गया।
गोपियाँ दही बरसा रही हैं और गोप दही-दूध-घी, नवनीत, हरिद्राचूर्ण, केसर तथा इत्र-फुलेल का घोल (दधिकांदा) बनाकर व्रजवासियों के ऊपर उड़ेल रहे हैं। प्रेममग्न व्रजवासियों के हृदय में जो राधारस भरा था वह मूर्तिमान होकर सबके मुख से निकल रहा है–

राधा रानी ने जन्म लियौ है।
सब सुखदानी ने जनम लियौ है॥
भानु दुलारी ने जनम लियौ है।
कीर्ति कुमारी ने जनम लियौ है॥
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“जय जय श्री राधे”
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