गीता की शपथ कोर्ट में नही खिलाते,लेकिन फिल्मी कोर्ट में क्यो?

हुजूर..मैं गीता पर हाथ रखकर कसम खाता हूं कि जो कुछ कहुंगा सच कहुगा, सच के अलावा कुछ नहीं कहुंगा’। कुछ ऐसे ही सीन फिल्मो में दिखाते है। जिसमे गीता की शपथ खाकर लोगो को साफ झूठ बोलते हुये दिखाया जाता है।

यह फिल्मी साजिश वर्षों से आजाद भारत मे चल रही है।लेकिन अदालत में ऐसा कुछ नही होता फिर फिल्मों में ही ऐसे सीन डालकर क्या सन्देश दे रही है फिल्मी दुनिया?

अदालतों में ऐसे सीन केवल फिल्मों में ही देखे जाते हैं। लेकिन हकीकत है कि कोई भी शख्स गीता की कसम खा कर कोर्ट में गवाही नहीं देता। यह सब खत्म हुए 170 साल हो चुके हैं।

लेकिन इसके बावजूद फिल्मों में आज भी यह सब चल रहा है लोगों को लगता है गवाही देते समय गीता की कसम खाई जाती है।

वास्तिकता की दुनिया में स्थिति थोड़ी भिन्न है। भारतीय दंड संहिता में ओथ एक्ट 1840 में (शपथ अधिनियम) तो है। यह आस्था और निष्ठा पर निर्भर करता है। बयान से पहले गवाह शपथ लेगा तभी वह बयान साक्ष्य माना जाएगा।

लेकिन शपथ की फोर्म तय नहीं की गई है। (यानि कि शपथ गीता, कुरान, बाइबल या अन्य किस धर्म ग्रंथ की होगी, इसका जिक्र नहीं है)। गवाही के दौरान सिर्फ परमेश्वर के नाम पर कसमें खाई जाती हैं। अग्रेंजों के जमाने में जरुर इस तरह की कसमें खा कर गवाही दी जाती थी। अंग्रेजों के जमाने में इसकी काफी अहमियत थी। बाद में धीरे-धीरे इसका प्रचलन खत्म हो गया।

1840 मे सरकार ने कानून बना कर इसका दायरा बढ़ा दिया कि लोग चाहे तो ईश्वर या अल्लाह की कसम खा कर गवाही दे सकते हैं, यही सिलसिला चल पड़ा। शुरू में अंग्रेजों ने सोचा इस देश के लोग धर्म के प्रति ज्यादा भावुक हैं इसलिए गीता या कुरान की कसम खाकर झूठ नहीं बोल सकते । इस लिहाज से इसे लागू किया गया था। लेकिन जल्द ही अंग्रेजों को लगा कि इसका ज्यादा मतलब नहीं है।

इसलिए महज परमेश्वर की कसम खाकर गवाही देने का सिलसिला शुरू कर दिया गया।

वकील कहते हैं कि मैंने तो कभी भी गीता की कसम खा कर गवाही देते नहीं देखा। हां यह जरूर है कि फिल्मों में गीता की कसम खाकर गवाही देने का सिलसिला जारी है।

आखिर फिल्मों में यह बदलाव क्यों नहीं आया। वह कहते हैं कि हो सकता है फिल्मी निर्देशकों का ध्यान इस ओर नहीं गया या जानबूझकर ऐसा कर रहे है।