दिन-रात कड़ी मेहनत करके घर पर ही सभी लोगों को किया स्वस्थ

( चिचोली ब्लॉक के असाढ़ी गांव की कहानी)

जितेन्द्र निगम -चिचोली

बैतूल जिले के चिचोली तहसील मुख्यालय से आठ किलोमीटर दूर ग्रामीण अंचल में बसे छोटे से गांव असाढ़ी के एक ही परिवार के 19 लोगों पर कोरोना संक्रमण का कहर टूट पड़ा. लेकिन इसी परिवार के युवा डॉक्टर बेटे ने अपनी जीवटता, कड़ी मेहनत,आत्मविश्वास और सेवा भावना के सहारे एक सेनानायक की तरह भूमिका निभाकर पूरे परिवार को कोरोना से निजात दिला दी. शुक्ला परिवार के इस डॉक्टर बेटे की कड़ी मेहनत लगन और सेवा भावना की सर्वत्र चर्चा हो रही है.

असाढ़ी के शुक्ला परिवार पर कोरोना के कहर की शुरुआत 28 अप्रैल को हुई . जब इसी परिवार के कैलाश शुक्ला कोरोना से संक्रमित हो गए. संयुक्त परिवार के चलते कोरोना संक्रमण की कड़ी जुड़ते चली गई और फिर एक के बाद एक इस परिवार के 19 लोगों को कोरोना ने अपनी गिरफ्त मे ले लिया. इनमें दो वर्ष की एक अल्पायु बेटी के साथ 86 वर्ष की एक बुजुर्ग महिला भी शामिल थी. चिंता का विषय यह था कि परिवार के बुजुर्ग सदस्यों में अधिकांश लोग हाइपरटेंशन, डायबिटीज और अस्थमा के मरीज हैं.

इस भयावह आपदा के बाद परिवार के लोगों की चिंताएं लगातार बढ़ने लगी. असाढ़ी जैसे सुविधा विहीन गांव में न तो कोई स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध थी और न ही इतने लोगों को किसी हॉस्पिटल में भर्ती कराना संभव था .इन विषम परिस्थितियों के बीच ग्रामीण क्षेत्र मे ही कार्य कर रहा इसी परिवार का युवा डॉक्टर बेटा संकटमोचन बनकर सामने आया.उसने पूरे परिवार को संभालने की चुनौती स्वीकार की और 28 अप्रैल से ही परिवार के सभी सदस्यों को आइसोलेट कर उनका उपचार शुरू कर दिया.

डॉक्टर नीलम शुक्ला ने बताया कि परिवार के 19 लोगों के कोरोना संक्रमित होने पर सभी को संभालना एक चुनौतीपूर्ण कार्य था . लेकिन उन्होंने ईश्वरीय शक्ति और बुजुर्गों के आशीर्वाद से इस चुनौती को स्वीकार किया और सभी के उपचार में जुट गए. इस कार्य में उनके भाई भरत शुक्ला ने उनका बखूबी साथ निभाया. डॉक्टर नीलम के मुताबिक उन्होंने परिवार के सभी लोगों को आइसोलेट किया और अपने अनुभवों और नागपुर , भोपाल और पाढर के विशेषज्ञ डॉक्टरों की सलाह से सभी का उपचार शुरू किया. इसमें अस्थमा ,डायबिटीज एवं हाइपरटेंशन से पीड़ित बुजुर्गों का दिन रात ध्यान रखना पड़ा . लगातार मेहनत के बाद उन्होंने परिवार के सभी सदस्यों को कोरोना जैसी महामारी से निजात दिला दी . हालांकि बीच में तीन सदस्यों का स्वास्थ्य बिगड़ने पर उन्हें पाढर के अस्पताल में भी भर्ती कराना पड़ा लेकिन डॉक्टर नीलम शुक्ला ने वहां पहुंच कर भी उनकी सेवा में कोई कसर नही रखी.डॉक्टर शुक्ला ने बताया कि वह घर में एकमात्र स्वस्थ व्यक्ति थे इसलिए उन्हें अपने डॉक्टरी कार्य के अलावा ऑक्सीजन सिलेंडर, दवाइयां एवं अन्य कार्यों के लिए भी दौड़ भाग करना पड़ा.इस पूरे दौर में डॉक्टर शुक्ला ने एक अच्छे डॉक्टर के साथ साथ एक कुशल नर्स ,एक जिम्मेदार अटेंडेंट और एक बेहतर पारिवारिक संरक्षक की भूमिका भी निभाई. इस बीच डॉ शुक्ला ने समय पर समय समय पर अपने ग्रामीण क्षेत्र में भी लोगों को स्वास्थ्य सुविधाएं प्रदान की.

कोविड से निजात पाने के बाद एक चर्चा में परिवार के बुजुर्गों के आंसू छलक आए और उन्होंने अपने डाक्टर बेटे की सेवा समर्पण और त्याग की भावना की जमकर सराहना की.परिजनों ने उन्हें देवदूत करार दिया.