आदिवसी दिवस पर आदिवासी फोक स्टूडियो पर दिखेगा आदिवासी समाज का सबसे पंसदीदा गाना रोन दोहे ना..

बेतुल से शुरु किये गए आदिवासी फोक स्टूडियो पर कल आदिवासि दिवस पर आदिवासी समाज का सबसे प्रचलित और सबसे पंसदीदा गाना रोन दोहे ना दादा रोन दोहे ना रिलीज किया जाएगा ये एक पारम्परिक आदिवासी लोकगीत है जो कि समाज का सबसे
पसंदीदा और प्रचलित गीत माना जाता है समाज के लोगो के अनुसार समाज के किसी भी कार्यक्रम में ये गीत जरूर बजता है ख़ासकर जब बात डांस और नाचने या नचाने की हो
इस गाने के बोल है रोन दोहे ना दादा रोन दोहे ना इस गाने में बेटा अपने पिता से बोल रहा है कि पिताजी मुझे गन्ना बॉडी में घर बनाने दो जिसमे मैं शादी करके अपनी पत्नी के साथ रहुगा इसी कड़ी में वो आगे बोलता है कि दादा मेरी किस लड़की से शादी होनी चाहिए साड़ी वाली से या लुगड़े वाली से और वो आगे कहता है कि मेरी शादी साड़ी वाली के साथ होनी चाहिए

ये काफी पुराना लोकगीत है जिसे राजेश सरियाम जी ने बहुत ही सुंदर तरीके से गया है और इसका संगीत अखलेश जैन के द्वारा बहुत ही सुंदरता से बनाया गया है
गाने के निर्माता निर्देशक स्मिता मनोज लोखंडे के द्वारा बहुत ही खूबसूरती से इसे निर्मित किया गया है
इधर राजेश सरियाम जी का केहना की आआदिवसी दिवस पर समाज के लिए हम सभी की ओर से ये एक छोटा सा तोहफा है उम्मीद है लोग इसे जरूर पसंद करेंगे
आदिवासी फोक स्टूडियो पर डाले गए सभी गांनो को लोग बहुत ही पसन्द कर रहे है हम आगे भी ऐसे ही शानदार गीत लोगो के लिए लेकर आते रहेंगे